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Rigveda Mandal 7 / Sukta 36 / Mantra 6

104 Sukta
9 Mantra
7/36/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ यत्सा॒कं य॒शसो॑ वावशा॒नाः सर॑स्वती स॒प्तथी॒ सिन्धु॑माता। याः सु॒ष्वय॑न्त सु॒दुघाः॑ सुधा॒रा अ॒भि स्वेन॒ पय॑सा॒ पीप्या॑नाः ॥६॥

आ । यत् । सा॒कम् । य॒शसः॑ । वा॒व॒शा॒नाः । सर॑स्वती । स॒प्तथी॑ । सिन्धु॑ऽमाता । याः । सु॒स्वय॑न्त । सु॒ऽदुघाः॑ । सु॒ऽधा॒राः । अ॒भि । स्वेन॑ । पय॑सा । पीप्या॑नाः ॥

Mantra without Swara
आ यत्साकं यशसो वावशानाः सरस्वती सप्तथी सिन्धुमाता। याः सुष्वयन्त सुदुघाः सुधारा अभि स्वेन पयसा पीप्यानाः ॥

आ। यत्। साकम्। यशसः। वावशानाः। सरस्वती। सप्तथी। सिन्धुऽमाता। याः। सुस्वयन्त। सुऽदुघाः। सुऽधाराः। अभि। स्वेन। पयसा। पीप्यानाः ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जिन की (सिन्धुमाता) नदियों का परिमाण करनेवाली सी (यत्) जो (सप्तथी) सातवीं (सरस्वती) उत्तम वाणी वर्त्तमान (याः) जो (स्वेन) अपने (पयसा) जल के (साकम्) साथ (पीप्यानाः) बढ़ती हुई नदियों के समान (सुदुघाः) सुन्दर कामों को पूरी करनेवाली (सुधाराः) सुन्दर धाराओं से युक्त (यशसः) कीर्त्ति की (वावशानाः) कामना करती हुई विदुषी स्त्री (अभि, आ, सुष्वयन्त) सब ओर से जाती हैं, वे निरन्तर मान करने योग्य होती हैं ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे छः अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रिय और मन के बीच कर्मेन्द्रिय वाणी सुन्दर शोभायुक्त है और जैसे जल से पूर्ण नदी शोभा पाती है, वैसे विद्या और सत्य की कामना करती हुई पूर्ण कामनावाली स्त्री श्रेष्ठ और मान करने योग्य हीती है ॥६॥
Subject
फिर कैसी स्त्रियाँ श्रेष्ठ होती हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥