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Rigveda Mandal 7 / Sukta 36 / Mantra 2

104 Sukta
9 Mantra
7/36/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मां वां॑ मित्रावरुणा सुवृ॒क्तिमिषं॒ न कृ॑ण्वे असुरा॒ नवी॑यः। इ॒नो वा॑म॒न्यः प॑द॒वीरद॑ब्धो॒ जनं॑ च मि॒त्रो य॑तति ब्रुवा॒णः ॥२॥

इ॒माम् । वा॒म् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । सु॒ऽवृ॒क्तिम् । इष॑म् । न । कृ॒ण्वे॒ । अ॒सु॒रा॒ । नवी॑यः । इ॒नः । वा॒म् । अ॒न्यः । प॒द॒वीः । अद॑ब्धः । जन॑म् । च॒ । मि॒त्रः । य॒त॒ति॒ । ब्रु॒वा॒णः ॥

Mantra without Swara
इमां वां मित्रावरुणा सुवृक्तिमिषं न कृण्वे असुरा नवीयः। इनो वामन्यः पदवीरदब्धो जनं च मित्रो यतति ब्रुवाणः ॥

इमाम्। वाम्। मित्रावरुणा। सुऽवृक्तिम्। इषम्। न। कृण्वे। असुरा। नवीयः। इनः। वाम्। अन्यः। पदवीः। अदब्धः। जनम्। च। मित्रः। यतति। ब्रुवाणः ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 2

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Meaning
हे (असुरा) प्राणों में रमते हुए (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशको ! जो (अन्यः) और जन (पदवी) पद को प्राप्त होता और (अदब्धः) अहिंसित (मित्रः) सखा (इनः) ईश्वर (ब्रुवाणः) उपदेश करता हुआ (वाम्) तुम दोनों को (जनम्, च) और जन को भी (नवीयः) अत्यन्त नवीन व्यवहार की प्राप्ति कराने का (यतति) यत्न कराता तथा (वाम्) तुम दोनों की (इमाम्) इस प्रत्यक्ष (सुवृक्तिम्) जिससे सुन्दरता से दुःखों की निवृत्ति करते हैं उस सत्य वाणी को (इषम्) इच्छा वा अन्न के (न) समान देता है, जिसको कि मैं परोपकार के लिये (कृण्वे) सिद्ध करता हूँ, उस को मैं और तुम नित्य सेवें ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप जो सब के लिये अलग सर्वव्यापी सब का मित्र जगदीश्वर सब के हित के लिये सदैव प्रवृत्त है, उसी की उपासना कर मोक्ष पद को प्राप्त होवें ॥२॥
Subject
फिर मनुष्य किस को सेवें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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