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Rigveda Mandal 7 / Sukta 35 / Mantra 5

104 Sukta
15 Mantra
7/35/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शं नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी पू॒र्वहू॑तौ॒ शम॒न्तरि॑क्षं दृ॒शये॑ नो अस्तु। शं न॒ ओष॑धीर्व॒निनो॑ भवन्तु॒ शं नो॒ रज॑स॒स्पति॑रस्तु जि॒ष्णुः ॥५॥

शम् । नः॒ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । पू॒र्वऽहू॑तौ । शम् । अ॒न्तरि॑क्षम् । दृ॒शये॑ । नः॒ । अ॒स्तु॒ । शम् । नः॒ । ओष॑धीः । व॒निनः॑ । भ॒व॒न्तु॒ । शम् । नः॒ । रज॑सः । पतिः॑ । अ॒स्तु॒ । जि॒ष्णुः ॥

Mantra without Swara
शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु। शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः ॥

शम्। नः। द्यावापृथिवी इति। पूर्वऽहूतौ। शम्। अन्तरिक्षम्। दृशये। नः। अस्तु। शम्। नः। ओषधीः। वनिनः। भवन्तु। शम्। नः। रजसः। पतिः। अस्तु। जिष्णुः ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 28 Mantra » 5

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Meaning
हे जगदीश्वर और शिक्षा देनेवाले ! आप की कृपा और उपदेश से (पूर्वहूतौ) जिसमें पिछलों की प्रशंसा विद्यमान वा जिससे पिछलों की प्रशंसा होती है उस में (द्यावापृथिवी) बिजुली और भूमि (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुख (दृशये) देखने को (अन्तरिक्षम्) भूमि और सूर्य्य के बीच का आकाश (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप (अस्तु) हो और (ओषधीः) ओषधि तथा (वनिनः) वन जिसमें विद्यमान वे वृक्ष (नः) हमारे लिये (शम्) सुखरूप (भवन्तु) होवें (रजसः) लोकों में उत्पन्न हुओं का (पतिः) स्वामी (जिष्णुः) जयशील (नः) हमारे लिये (शम्) सुखरूप (अस्तु) हो ॥५॥
Essence
जो सब सृष्टिस्थ पदार्थों को सुख के लिये संयुक्त करने को योग्य होते हैं, वे ही उत्तम विद्वान् होते हैं ॥५॥
Subject
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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