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Rigveda Mandal 7 / Sukta 34 / Mantra 21

104 Sukta
25 Mantra
7/34/21
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिपाद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्रति॑ नः॒ स्तोमं॒ त्वष्टा॑ जुषेत॒ स्याद॒स्मे अ॒रम॑तिर्वसू॒युः ॥२१॥

प्रति॑ । नः॒ । स्तोम॑म् । त्वष्टा॑ । जु॒षे॒त॒ । स्यात् । अ॒स्मे इति॑ । अ॒रम॑तिः । व॒सु॒ऽयुः ॥

Mantra without Swara
प्रति नः स्तोमं त्वष्टा जुषेत स्यादस्मे अरमतिर्वसूयुः ॥

प्रति। नः। स्तोमम्। त्वष्टा। जुषेत। स्यात्। अस्मे इति। अरमतिः। वसुऽयुः ॥२१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 27 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे विद्वानो ! जैसे हम लोग राजा की प्रीति से सेवा करें, वैसे (अरमतिः) पूर्ण मति है जिस की (वसूयुः) धनों की कामना करता हुआ (त्वष्टा) दुःखविच्छेद करनेवाला राजा (नः) हम लोगों को (प्रति, जुषेत) प्रीति से सेवे जैसे यह राजा हमारी (स्तोमम्) प्रशंसा को सेवे, वैसे हम लोग इसकी कीर्ति को सेवें जैसे यह (अस्मे) हम लोगों में प्रसन्न (स्यात्) हो, वैसे हम लोग भी इस में प्रसन्न हों ॥२१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जहाँ राजा अमात्यभृत्य और प्रजाजन एक-दूसरे की उन्नति को करना चाहते हैं, वहाँ समस्त ऐश्वर्य, सुख और वृद्धि होती है ॥२१॥
Subject
फिर वे राजा और मन्त्री आदि परस्पर कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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