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Rigveda Mandal 7 / Sukta 34 / Mantra 16

104 Sukta
25 Mantra
7/34/16
Devata- अहिः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिगार्चीगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ब्जामु॒क्थैरहिं॑ गृणीषे बु॒ध्ने न॒दीनां॒ रजः॑सु॒ षीद॑न् ॥१६॥

अ॒प्ऽजाम् । उ॒क्थैः । अहि॑म् । गृ॒णी॒षे॒ । बु॒ध्ने । न॒दीना॑म् । रजः॑ऽसु । सीद॑न् ॥

Mantra without Swara
अब्जामुक्थैरहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां रजःसु षीदन् ॥

अप्ऽजाम्। उक्थैः। अहिम्। गृणीषे। बुध्ने। नदीनाम्। रजःऽसु। सीदन् ॥१६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 26 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जैसे सूर्य (बुध्ने) अन्तरिक्ष में वर्त्तमान (नदीनाम्) नदियों के सम्बन्धी (रजःसु) लोकों में (सीदन्) स्थिर होता हुआ (अब्जाम्) जलों में उत्पन्न हुए (अहिम्) मेघ को उत्पन्न करता है, वैसे (उक्थैः) उसके गुणों के प्रशंसक वचनों से राज्य में जो ऐश्वर्य उनमें स्थिर होते हुए आप नदियों के प्रवाह के समान जिससे विद्या को (गृणीषे) कहते हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे राजपुरुषो ! जैसे सूर्य वर्षा से नदियों को पूर्ण करता है, वैसे धन-धान्यों से तुम प्रजाओं को पूर्ण करो ॥१६॥
Subject
फिर वे राजजन किसके तुल्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥