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Rigveda Mandal 7 / Sukta 33 / Mantra 6

104 Sukta
14 Mantra
7/33/6
Devata- त एव Rishi- वसिष्ठपुत्राः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
द॒ण्डाइ॒वेद्गो॒अज॑नास आस॒न्परि॑च्छिन्ना भर॒ता अ॑र्भ॒कासः॑। अभ॑वच्च पुरए॒ता वसि॑ष्ठ॒ आदित्तृत्सू॑नां॒ विशो॑ अप्रथन्त ॥६॥

द॒ण्डाऽइ॑व । इत् । गो॒ऽअज॑नासः । आ॒स॒न् । परि॑ऽच्छिन्नाः । भ॒र॒ताः । अ॒र्भ॒कासः॑ । अभ॑वत् । च॒ । पु॒रः॒ऽए॒ता । वसि॑ष्ठः । आत् । इत् । तृत्सू॑नाम् । विशः॑ । अ॒प्र॒थ॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
दण्डाइवेद्गोअजनास आसन्परिच्छिन्ना भरता अर्भकासः। अभवच्च पुरएता वसिष्ठ आदित्तृत्सूनां विशो अप्रथन्त ॥

दण्डाऽइव। इत्। गोऽअजनासः। आसन्। परिऽच्छिन्नाः। भरताः। अर्भकासः। अभवत्। च। पुरःऽएता। वसिष्ठः। आत्। इत्। तृत्सूनाम्। विशः। अप्रथन्त ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 23 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जो (गोअजनासः) सुशिक्षित वाणी में अप्रसिद्ध हुए (परिच्छिन्नाः) छिन्न-भिन्न विज्ञानवाले (भरताः) देह धारण और पुष्टि करने से युक्त (अर्भकासः) थोड़ी-थोड़ी आयु के बालक (दण्डाइव) लट्ठ से सूखे हृदय में अभिमान करनेवाले (इत्) ही (आसन्) हैं उन (तृत्सूनाम्) अनादर किये हुओं के बीच (विशः) प्रजा मनुष्यों को (अप्रथन्त) प्रख्यात करते हैं (आत्, इत्) और ही इनके जो (पुरएता) आगे जानेवाला (वसिष्ठः) अतीव धनाढ्य (अभवत्) हो (च) वही इन को अच्छी प्रकार शिक्षा दे ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य दण्ड के समान जड़बुद्धि हों, वे अच्छी परीक्षा कर न पढ़ाने योग्य और जो बुद्धिमान् हों वे पढ़ाने योग्य होते हैं, जो विद्या व्यवहार में प्रधान हो, वही विद्याविभाग की उत्तम प्रबन्ध से शिक्षा पहुँचावे ॥६॥
Subject
फिर कौन पढ़ाने और कौन न पढ़ाने योग्य हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥