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Rigveda Mandal 7 / Sukta 33 / Mantra 5

104 Sukta
14 Mantra
7/33/5
Devata- त एव Rishi- वसिष्ठपुत्राः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उद्द्यामि॒वेत्तृ॒ष्णजो॑ नाथि॒तासोऽदी॑धयुर्दाशरा॒ज्ञे वृ॒तासः॑। वसि॑ष्ठस्य स्तुव॒त इन्द्रो॑ अश्रोदु॒रुं तृत्सु॑भ्यो अकृणोदु लो॒कम् ॥५॥

उत् । द्याम्ऽइ॑व । इत् । तृ॒ष्णऽजः॑ । ना॒थि॒तासः॑ । अदी॑धयुः । दा॒श॒ऽरा॒ज्ञे । वृ॒तासः॑ । वसि॑ष्ठस्य । स्तु॒व॒तः । इन्द्रः॑ । अ॒श्रो॒त् । उ॒रुम् । तृत्सु॑ऽभ्यः । अ॒कृ॒णो॒त् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् ॥

Mantra without Swara
उद्द्यामिवेत्तृष्णजो नाथितासोऽदीधयुर्दाशराज्ञे वृतासः। वसिष्ठस्य स्तुवत इन्द्रो अश्रोदुरुं तृत्सुभ्यो अकृणोदु लोकम् ॥

उत्। द्याम्ऽइव। इत्। तृष्णऽजः। नाथितासः। अदीधयुः। दाशऽराज्ञे। वृतासः। वसिष्ठस्य। स्तुवतः। इन्द्रः। अश्रोत्। उरुम्। तृत्सुऽभ्यः। अकृणोत्। ऊँ इति। लोकम् ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (द्यामिव) सूर्य के समान (नाथितासः) माँगते हुए और (तृष्णजः) तृष्णा को प्राप्त (वृतासः) स्वीकार किये हुए (इत्) ही (दाशराज्ञे) देनेवालों के राजा के लिये (उत्, अदीधयुः) ऊपर को प्रकाशित करें जो (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (वसिष्ठस्य) अतीव विद्वान् की (स्तुवतः) स्तुति करनेवाले के लिये =वाले की (उरुम्) बहुत सुख करनेवाले वाक्य को (अश्रोत्) सुने (तृत्सुभ्यः) और शत्रुओं के मारनेवाले के लिये (उ) ही (लोकम्) लोक को (अकृणोत्) प्रसिद्ध करता है, उनको सब सत्कार करें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य सूर्य के समान विद्या और नम्रता से प्रकाशित और तृषित जल के समान ऐश्वर्य के ढूँढ़नेवाले सकल विद्यायुक्त विद्वानों के लिये आनन्द को धारण करते और शूरवीरों के लिये धन भी देते हैं, वे बहुत सुख पाते हैं ॥५॥
Subject
फिर कौन मनुष्य सूर्य के तुल्य होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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