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Rigveda Mandal 7 / Sukta 33 / Mantra 4

104 Sukta
14 Mantra
7/33/4
Devata- त एव Rishi- वसिष्ठपुत्राः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जुष्टी॑ नरो॒ ब्रह्म॑णा वः पितॄ॒णामक्ष॑मव्ययं॒ न किला॑ रिषाथ। यच्छक्व॑रीषु बृह॒ता रवे॒णेन्द्रे॒ शुष्म॒मद॑धाता वसिष्ठाः ॥४॥

जुष्टी॑ । न॒रः॒ । ब्रह्म॑णा । वः॒ । पि॒तॄ॒णाम् । अक्ष॑म् । अ॒व्य॒य॒म् । न । किल॑ । रि॒षा॒थ॒ । यत् । शक्व॑रीषु । बृ॒ह॒ता । रवे॑ण । इन्द्रे॑ । शुष्म॑म् । अद॑धात । व॒सि॒ष्ठाः॒ ॥

Mantra without Swara
जुष्टी नरो ब्रह्मणा वः पितॄणामक्षमव्ययं न किला रिषाथ। यच्छक्वरीषु बृहता रवेणेन्द्रे शुष्ममदधाता वसिष्ठाः ॥

जुष्टी। नरः। ब्रह्मणा। वः। पितॄणाम्। अक्षम्। अव्ययम्। न। किल। रिषाथ। यत्। शक्वरीषु। बृहता। रवेण। इन्द्रे। शुष्मम्। अदधात। वसिष्ठाः ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 4

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Meaning
हे (वसिष्ठाः) धन में अत्यन्त वास करते हुए (नरः) नायक मनुष्यो ! तुम (यत्) जिस (बृहता) महान् (रवेण) शब्द से (शक्वरीषु) शक्तियुक्त सेनाओं में और (इन्द्रे) परमैश्वर्य में (शुष्मम्) बल को (अदधात) धारण करते हो (जुष्टी) प्रीति वा सेवा से तथा (ब्रह्मणा) धन से (वः) आप के (पितॄणाम्) जनक अर्थात् पिता आदि का जो (अव्ययम्) नाशरहित (अक्षम्) व्याप्त बल उसे (किल) निश्चय कर तुम (न, रिषाथ) नहीं नष्ट करते हो, उससे सब की रक्षा करो ॥४॥
Essence
जो मनुष्य अपनी शक्ति को बढ़ा के दुष्टों को मार धन की वृद्धि से सब के अर्थ जो नष्ट नहीं, उस सुख को प्रीति से बढ़ाते, वे बड़ी कीर्ति को पाते हैं ॥४॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करके क्या नहीं करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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