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Rigveda Mandal 7 / Sukta 33 / Mantra 2

104 Sukta
14 Mantra
7/33/2
Devata- त एव Rishi- वसिष्ठपुत्राः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दू॒रादिन्द्र॑मनय॒न्ना सु॒तेन॑ ति॒रो वै॑श॒न्तमति॒ पान्त॑मु॒ग्रम्। पाश॑द्युम्नस्य वाय॒तस्य॒ सोमा॑त्सु॒तादिन्द्रो॑ऽवृणीता॒ वसि॑ष्ठान् ॥२॥

दू॒रात् । इन्द्र॑म् । अ॒न॒य॒न् । आ । सु॒तेन॑ । ति॒रः । वै॒श॒न्तम् । अति॑ । पान्त॑म् । उ॒ग्रम् । पाश॑ऽद्युम्नस्य । वा॒य॒तस्य॑ । सोमा॑त् । सु॒तात् । इन्द्रः॑ । अ॒वृ॒णी॒त॒ । वसि॑ष्ठान् ॥

Mantra without Swara
दूरादिन्द्रमनयन्ना सुतेन तिरो वैशन्तमति पान्तमुग्रम्। पाशद्युम्नस्य वायतस्य सोमात्सुतादिन्द्रोऽवृणीता वसिष्ठान् ॥

दूरात्। इन्द्रम्। अनयन्। आ। सुतेन। तिरः। वैशन्तम्। अति। पान्तम्। उग्रम्। पाशऽद्युम्नस्य। वायतस्य। सोमात्। सुतात्। इन्द्रः। अवृणीत। वसिष्ठान् ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सुतेन) उत्पन्न हुए पदार्थ वा पुत्र से (वैशन्तम्) प्रवेश होते हुए जन के सम्बन्धी (पान्तम्) पालना करते हुए (उग्रम्) तेजस्वी (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् को (दूरात्) दूर से (अनयन्) पहुँचाते और दारिद्र्य को (तिरः) तिरस्कार करते हैं उनसे (पाशद्युम्नस्य) जिसने धन यश पाया है उस (वायतस्य) विज्ञानवान् के (सुतात्) धर्म से उत्पन्न किये (सोमात्) ऐश्वर्य से (इन्द्रः) परमैश्वर्य राजा (वसिष्ठान्) अतीव विद्याओं में किया निवास जिन्होंने उन को (अति, आ, अवृणीत) अत्यन्त स्वीकार करे ॥२॥
Essence
हे राजन् आदि जनो ! जो दूर से अपने देश को ऐश्वर्य पहुँचाते और दारिद्र्य का विनाश कर लक्ष्मी को उत्पन्न करते हैं, उन उत्तम जनों की निरन्तर रक्षा कीजिये ॥२॥
Subject
फिर वह राजा कैसे विद्वानों को स्वीकार करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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