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Rigveda Mandal 7 / Sukta 33 / Mantra 12

104 Sukta
14 Mantra
7/33/12
Devata- त एव Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स प्र॑के॒त उ॒भय॑स्य प्रवि॒द्वान्त्स॒हस्र॑दान उ॒त वा॒ सदा॑नः। यमेन॑ त॒तं प॑रि॒धिं व॑यि॒ष्यन्न॑प्स॒रसः॒ परि॑ जज्ञे॒ वसि॑ष्ठः ॥१२॥

सः । प्र॒ऽके॒तः । उ॒भय॑स्य । प्र॒ऽवि॒द्वान् । स॒हस्र॑ऽदानः । उ॒त । वा॒ । सऽदा॑नः । यमेन॑ । त॒तम् । प॒रि॒ऽधिम् । व॒यि॒ष्यन् । अ॒प्स॒रसः॑ । परि॑ । ज॒ज्ञे॒ । वसि॑ष्ठः ॥

Mantra without Swara
स प्रकेत उभयस्य प्रविद्वान्त्सहस्रदान उत वा सदानः। यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परि जज्ञे वसिष्ठः ॥

सः। प्रऽकेतः। उभयस्य। प्रऽविद्वान्। सहस्रऽदानः। उत। वा। सऽदानः। यमेन। ततम्। परिऽधिम्। वयिष्यन्। अप्सरसः। परि। जज्ञे। वसिष्ठः ॥१२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (उभयस्य) जन्म और विद्या-जन्म दोनों का (प्रविद्वान्) उत्तम विद्वान् (प्रकेतः) उत्तम बुद्धियुक्त (सहस्रदानः) हजारों पदार्थ देनेवाला (उत, वा) अथवा (सदानः) दानयुक्त (यमेन) वायु वा बिजुली के साथ वर्त्तमान (ततम्) विस्तृत (परिधिम्) परिधि को (वयिष्यन्) खर्च करता हुआ (वसिष्ठः) अतीव धनवान् (अप्सरसः) अन्तरिक्ष में चलनेवाले वायु से (परि, जज्ञे) सर्वतः प्रसिद्ध होता है (सः) वह सब को सेवा करने योग्य है ॥१२॥
Essence
जिस मनुष्य का माता पिता से प्रथम जन्म, दूसरा आचार्य से विद्या द्वारा होता है, वही आकाश के पदार्थों को जाननेवाला उत्पन्न हुआ पूर्ण विद्वान् अतुल सुख का देनेवाला है ॥१२॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥