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Rigveda Mandal 7 / Sukta 33 / Mantra 10

104 Sukta
14 Mantra
7/33/10
Devata- त एव Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि॒द्युतो॒ ज्योतिः॒ परि॑ सं॒जिहा॑नं मि॒त्रावरु॑णा॒ यदप॑श्यतां त्वा। तत्ते॒ जन्मो॒तैकं॑ वसिष्ठा॒गस्त्यो॒ यत्त्वा॑ वि॒श आ॑ज॒भार॑ ॥१०॥

वि॒ऽद्युतः॑ । ज्योतिः॑ । परि॑ । स॒म्ऽजिहा॑नम् । मि॒त्रावरु॑णा । यत् । अप॑श्यताम् । त्वा॒ । तत् । ते॒ । जन्म॑ । उ॒त । एक॑म् । व॒सि॒ष्ठ॒ । अ॒गस्त्यः॑ । यत् । त्वा॒ । वि॒शः । आ॒ऽज॒भार॑ ॥

Mantra without Swara
विद्युतो ज्योतिः परि संजिहानं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा। तत्ते जन्मोतैकं वसिष्ठागस्त्यो यत्त्वा विश आजभार ॥

विऽद्युतः। ज्योतिः। परि। सम्ऽजिहानम्। मित्रावरुणा। यत्। अपश्यताम्। त्वा। तत्। ते। जन्म। उत। एकम्। वसिष्ठ। अगस्त्यः। यत्। त्वा। विशः। आऽजभार ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 23 Mantra » 5

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Meaning
हे (वसिष्ठ) प्रशंसायुक्त विद्वान् ! जो (अगस्त्यः) निर्दोष जन (ते) आपकी (विशः) प्रजाओं को (आ, जभार) सब ओर से धारण करता (उत) और (एकम्) एक (जन्म) जन्म को सब ओर से धारण करता और (त्वा) आप को सब ओर से धारण करता तथा (यत्) जिस (विद्युतः) बिजुली को (संजिहानम्) अधिकार त्याग करते हुए (ज्योतिः) प्रकाश को (मित्रावरुणा) अध्यापक और उपदेशक (परि, अपश्यताम्) सब ओर देखते हैं (त्वा) आपको इस विद्या की प्राप्ति कराते हैं, उस समस्त विषय को आप ग्रहण करें ॥१०॥
Essence
जिस मनुष्य का विद्या में जन्म प्रादुर्भाव होता है, उसकी बुद्धि बिजुली की ज्योति के समान सकल विद्याओं को धारण करती है ॥१०॥
Subject
फिर विद्वान् जन कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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