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Rigveda Mandal 7 / Sukta 33 / Mantra 1

104 Sukta
14 Mantra
7/33/1
Devata- त एव Rishi- वसिष्ठपुत्राः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
श्वि॒त्यञ्चो॑ मा दक्षिण॒तस्क॑पर्दा धियंजि॒न्वासो॑ अ॒भि हि प्र॑म॒न्दुः। उ॒त्तिष्ठ॑न्वोचे॒ परि॑ ब॒र्हिषो॒ नॄन्न मे॑ दू॒रादवि॑तवे॒ वसि॑ष्ठाः ॥१॥

श्वि॒त्यञ्चः॑ । मा । द॒क्षि॒ण॒तःऽक॑पर्दाः । धि॒य॒म्ऽजि॒न्वासः॑ । अ॒भि । हि । प्र॒ऽम॒न्दुः । उ॒त्ऽतिष्ठ॑न् । वो॒चे॒ । परि॑ । ब॒र्हिषः॑ । नॄन् । न । मे॒ । दू॒रात् । अवि॑तवे । वसि॑ष्ठाः ॥

Mantra without Swara
श्वित्यञ्चो मा दक्षिणतस्कपर्दा धियंजिन्वासो अभि हि प्रमन्दुः। उत्तिष्ठन्वोचे परि बर्हिषो नॄन्न मे दूरादवितवे वसिष्ठाः ॥

श्वित्यञ्चः। मा। दक्षिणतःऽकपर्दाः। धियम्ऽजिन्वासः। अभि। हि। प्रऽमन्दुः। उत्ऽतिष्ठन्। वोचे। परि। बर्हिषः। नॄन्। न। मे। दूरात्। अवितवे। वसिष्ठाः ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (श्वित्यञ्चः) बुद्धि को प्राप्त होते (दक्षिणतस्कपर्दाः) दाहिनी ओर को जटाजूट रखनेवाले (धियम्) बुद्धि को (जिन्वासः) प्राप्त हुए (वसिष्ठाः) अतीव विद्याओं में वसनेवाले (हि) ही (मा) मुझे (प्र, मन्दुः) आनन्दित करते हैं (मे) मेरे (अवितवे) पालने का (दूरात्) दूर से आवें उन (बर्हिषः) विद्या धर्म बढ़ानेवाले (नॄन्) नायक मनुष्यों को (उत्तिष्ठन्) उठता हुआ अर्थात् उद्यम के लिये प्रवृत्त हुआ (परि, वोचे) सब ओर से कहता हूँ ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो विद्याओं में प्रवीण, मनुष्यों की सत्य आचार में बुद्धि बढ़ानेवाले, पढ़ाने-पढ़ने और उपदेश करनेवाले हों उनको विद्या और धर्म के प्रचार के लिये निरन्तर शिक्षा, उत्साह और सत्कारयुक्त करें ॥१॥
Subject
अब चौदह ऋचावाले तेतीसवें सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में पढ़ाने और पढ़नेवाले क्या करें, इस विषय का वर्णन करते हैं ॥