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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 9

104 Sukta
27 Mantra
7/32/9
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मा स्रे॑धत सोमिनो॒ दक्ष॑ता म॒हे कृ॑णु॒ध्वं रा॒य आ॒तुजे॑। त॒रणि॒रिज्ज॑यति॒ क्षेति॒ पुष्य॑ति॒ न दे॒वासः॑ कव॒त्नवे॑ ॥९॥

मा । स्रे॒ध॒त॒ । सो॒मि॒नः॒ । दक्ष॑त । म॒हे । कृ॒णु॒ध्वम् । रा॒ये । आ॒ऽतुजे॑ । त॒रणिः॑ । इत् । ज॒य॒ति॒ । क्षेति॑ । पुष्य॑ति । न । दे॒वासः॑ । क॒व॒त्नवे॑ ॥

Mantra without Swara
मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे। तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे ॥

मा। स्रेधत। सोमिनः। दक्षत। महे। कृणुध्वम्। राये। आऽतुजे। तरणिः। इत्। जयति। क्षेति। पुष्यति। न। देवासः। कवत्नवे ॥९॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (देवासः) विद्वान् जन (कवत्नवे) कुत्सित कर्म में व्याप्ति के लिये (न) नहीं प्रवृत्त होते हैं, वैसे (सोमिनः) ओषधी आदि युक्त वा ऐश्वर्यवान् के (आतुजे) करनेवाले (महे) महान् (राये) धन के लिये (मा) मत (स्रेधत) विनाशो (दक्षत) बल पाओ सुकर्म (कृणुध्वम्) करो जो (तरणिः) पुरुषार्थी जन (इत्) ही (जयति) जीतता (क्षेति) जो निरन्तर वसता वा (पुष्यति) जो पुष्ट होता, वे सब बल पावें ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो अन्याय से किसी की हिंसा नहीं करते और धर्मात्माओं की वृद्धि करते हैं, वे विद्वान् जन सर्वदा जीतते, धर्म में निवास करते और पुष्ट होते हैं ॥९॥
Subject
फिर मनुष्य किसके तुल्य वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥