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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 8

104 Sukta
27 Mantra
7/32/8
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
सु॒नोता॑ सोम॒पाव्ने॒ सोम॒मिन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॑। पच॑ता प॒क्तीरव॑से कृणु॒ध्वमित्पृ॒णन्नित्पृ॑ण॒ते मयः॑ ॥८॥

सु॒नोत॑ । सो॒म॒ऽपाव्ने॑ । सोम॑म् । इन्द्रा॑य । व॒ज्रिणे॑ । पच॑त्स् । प॒क्तीः । अव॑से । कृ॒णु॒ध्वम् । इत् । पृ॒णन् । इत् । पृ॒ण॒ते । मयः॑ ॥

Mantra without Swara
सुनोता सोमपाव्ने सोममिन्द्राय वज्रिणे। पचता पक्तीरवसे कृणुध्वमित्पृणन्नित्पृणते मयः ॥

सुनोत। सोमऽपाव्ने। सोमम्। इन्द्राय। वज्रिणे। पचत। पक्तीः। अवसे। कृणुध्वम्। इत्। पृणन्। इत्। पृणते। मयः ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 3

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Meaning
हे वैद्यशास्त्रवेत्ता विद्वानो ! तुम (सोमपाव्ने) बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को पीनेवाले के लिये (सोमम्) ऐश्वर्य्य को (सुनोता) उत्पन्न करो (वज्रिणे) शस्त्र और अस्त्रों को धारण करने और (इन्द्राय) दुष्ट शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाले के लिये ऐश्वर्य्य को उत्पन्न करो सब की (अवसे) रक्षा के लिये (पक्तीः) पाकों को (पचत) पकाओ (कृणुध्वम्, इत्) करो ही जैसे (पृणन्) पालना करता हुआ विद्वान् (मयः) सुख को (पृणते) पालता है, वैसे (इत्) ही प्रजाजनों के लिये सुख पालो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो वैद्य हों वे उत्तम ओषधि, प्रशंसायुक्त रोगनाशक रस और उत्तम अन्न पाकों की सब मनुष्यों के प्रति शिक्षा दें, जिससे पूर्ण सुख हो ॥८॥
Subject
फिर राजा को वैद्यों से क्या कराना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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