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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 6

104 Sukta
27 Mantra
7/32/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स वी॒रो अप्र॑तिष्कुत॒ इन्द्रे॑ण शूशुवे॒ नृभिः॑। यस्ते॑ गभी॒रा सव॑नानि वृत्रहन्त्सु॒नोत्या च॒ धाव॑ति ॥६॥

सः । वी॒रः । अप्र॑तिऽस्कुतः । इन्द्रे॑ण । शू॒शु॒वे॒ । नृऽभिः॑ । यः । ते॒ । ग॒भी॒रा । सव॑नानि । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । सु॒नोति॑ । आ । च॒ । धाव॑ति ॥

Mantra without Swara
स वीरो अप्रतिष्कुत इन्द्रेण शूशुवे नृभिः। यस्ते गभीरा सवनानि वृत्रहन्त्सुनोत्या च धावति ॥

सः। वीरः। अप्रतिऽस्कुतः। इन्द्रेण। शूशुवे। नृऽभिः। यः। ते। गभीरा। सवनानि। वृत्रऽहन्। सुनोति। आ। च। धावति ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 1

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Meaning
हे (वृत्रहन्) शत्रुओं को मारनेवाले ! (यः) जो (ते) आपका (अप्रतिष्कुतः) इधर उधर से निष्कंप (वीरः) निर्भय पुरुष (इन्द्रेण) परमैश्वर्य और (नृभिः) नायक मनुष्यों के साथ (शूशुवे) समीप आता है (गभीरा) गम्भीर (सवनानि) प्रेरणाओं को (सुनोति) उत्पन्न करता है शीघ्र (आ, धावति, च) दौड़ता है (सः) वही शत्रुओं को जीत सकता है ॥६॥
Essence
जो उत्तम पुरुषों के साथ सब ओर से मित्रता और दुष्टों के साथ वैमनस्य रखते हैं, वे असंख्य ऐश्वर्य पाते हैं ॥६॥
Subject
फिर मनुष्य किनके साथ क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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