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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 4

104 Sukta
27 Mantra
7/32/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒म इन्द्रा॑य सुन्विरे॒ सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः। ताँ आ मदा॑य वज्रहस्त पी॒तये॒ हरि॑भ्यां या॒ह्योक॒ आ ॥४॥

इ॒मे । इन्द्रा॑य । सु॒न्वि॒रे॒ । सोमा॑सः । दधि॑ऽआशिरः । तान् । आ । मदा॑य । व॒ज्र॒ऽह॒स्त॒ । पी॒तये॑ । हरि॑ऽभ्याम् । या॒हि॒ । ओकः॑ । आ ॥

Mantra without Swara
इम इन्द्राय सुन्विरे सोमासो दध्याशिरः। ताँ आ मदाय वज्रहस्त पीतये हरिभ्यां याह्योक आ ॥

इमे। इन्द्राय। सुन्विरे। सोमासः। दधिऽआशिरः। तान्। आ। मदाय। वज्रऽहस्त। पीतये। हरिऽभ्याम्। याहि। ओकः। आ ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 4

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Meaning
हे (वज्रहस्त) शस्त्र और अस्त्रों को हाथ में रखनेवाले ! जो (इमे) यह (दध्याशिरः) धारण करने और व्याप्त होनेवाले (सोमासः) प्रेरक जन (मदाय) आनन्द और (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिये तथा (पीतये) पीने को (सुन्विरे) अच्छे रसों को उत्पन्न करते हैं (तान्) उनको (हरिभ्याम्) अच्छी सीख पाये हुए घोड़ों से युक्त रथ से (आ, याहि) आओ शुभ (ओकः) स्थान को (आ) प्राप्त होओ ॥४॥
Essence
जो पुरुषार्थ से विद्याओं को प्राप्त होकर उद्यम करते हैं, वे राज्यश्री को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Subject
फिर राजा आदि क्या आचरण करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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