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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 25

104 Sukta
27 Mantra
7/32/25
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
परा॑ णुदस्व मघवन्न॒मित्रा॑न्त्सु॒वेदा॑ नो॒ वसू॑ कृधि। अ॒स्माकं॑ बोध्यवि॒ता म॑हाध॒ने भवा॑ वृ॒धः सखी॑नाम् ॥२५॥

परा॑ । नु॒द॒स्व॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । अ॒मित्रा॑न् । सु॒ऽवेदा॑ । नः॒ । वसु॑ । कृ॒धि॒ । अ॒स्माक॑म् । बो॒धि॒ । अ॒वि॒ता । म॒हा॒ऽध॒ने । भव॑ । वृ॒धः । सखी॑नाम् ॥

Mantra without Swara
परा णुदस्व मघवन्नमित्रान्त्सुवेदा नो वसू कृधि। अस्माकं बोध्यविता महाधने भवा वृधः सखीनाम् ॥

परा। नुदस्व। मघऽवन्। अमित्रान्। सुऽवेदा। नः। वसु। कृधि। अस्माकम्। बोधि। अविता। महाऽधने। भव। वृधः। सखीनाम् ॥२५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) बहुधनयुक्त राजा (सुवेदाः) धर्म से उत्पन्न किये हुए ऐश्वर्ययुक्त ! आप (नः) हमारे (अमित्रान्) शत्रुओं को (परा, णुदस्व) प्रेरो हमारे लिये (वसु) धन को (कृधि) सिद्ध करो (महाधने) बड़े वा बहुत धन जिसमें प्राप्त होते हैं उस संग्राम में (अस्माकम्) हमारे (सखीनाम्) सर्व मित्रों के (अविता) रक्षा करनेवाले (बोधि) जानिये और (वृधः) बढ़नेवाले (भव) हूजिये ॥२५॥
Essence
हे राजा ! आप धार्मिक, शूरजनों का सत्कार कर उनको शिक्षा देकर युद्धविद्या में कुशल कर डाकू आदि दुष्टों को निवृत्त कर सर्वोपकारी मनुष्यों के रक्षा करनेवाले हूजिये ॥२५॥
Subject
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥