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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 23

104 Sukta
27 Mantra
7/32/23
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न त्वावाँ॑ अ॒न्यो दि॒व्यो न पार्थि॑वो॒ न जा॒तो न ज॑निष्यते। अ॒श्वा॒यन्तो॑ मघवन्निन्द्र वा॒जिनो॑ ग॒व्यन्त॑स्त्वा हवामहे ॥२३॥

न । त्वाऽवा॑न् । अ॒न्यः । दि॒व्यः । न । पार्थि॑वः । न । जा॒तः । न । ज॒नि॒ष्य॒ते॒ । अ॒श्व॒ऽयन्तः॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । इ॒न्द्र॒ । वा॒जिनः॑ । ग॒व्यन्तः॑ । त्वा॒ । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते। अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे ॥

न। त्वाऽवान्। अन्यः। दिव्यः। न। पार्थिवः। न। जातः। न। जनिष्यते। अश्वऽयन्तः। मघऽवन्। इन्द्र। वाजिनः। गव्यन्तः। त्वा। हवामहे ॥२३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) बहुधनयुक्त (इन्द्र) परम ऐश्वर्य देनेवाले जगदीश्वर ! जिससे कोई पदार्थ (न)(त्वावान्) आपके सदृश (अन्यः) और (दिव्यः) शुद्धस्वरूप पदार्थ है (न)(पार्थिवः) पृथिवी पर जाना हुआ है (न)(जातः) उत्पन्न हुआ है (न)(जनिष्यते) उत्पन्न होगा इससे (त्वा) आपकी (अश्वायन्तः) महान् विद्वानों की कामना करनेवाले (वाजिनः) विज्ञान और अन्नवाले और (गव्यन्तः) अपने को उत्तम वाणी वा उत्तम भूमि की इच्छा करनेवाले हम लोग (हवामहे) प्रशंसा करते हैं ॥२३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस कारण परमेश्वर से तुल्य अधिक अन्य पदार्थ कोई नहीं न उत्पन्न हुआ न कभी भी उत्पन्न होगा, इससे ही उसकी उपासना और प्रशंसा हम लोग नित्य करें ॥२३॥
Subject
परमेश्वर के तुल्य वा अधिक कोई नहीं है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥