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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 22

104 Sukta
27 Mantra
7/32/22
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒भि त्वा॑ शूर नोनु॒मोऽदु॑ग्धाइव धे॒नवः॑। ईशा॑नम॒स्य जग॑तः स्व॒र्दृश॒मीशा॑नमिन्द्र त॒स्थुषः॑ ॥२२॥

अ॒भि । त्वा॒ । शू॒र॒ । नो॒नु॒मः॒ । अदु॑ग्धाःऽइव । धे॒नवः॑ । ईशा॑नम् । अ॒स्य । जग॑तः । स्वः॒ऽदृश॑म् । ईशा॑नम् । इ॒न्द्र॒ । त॒स्थुषः॑ ॥

Mantra without Swara
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धाइव धेनवः। ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥

अभि। त्वा। शूर। नोनुमः। अदुग्धाःऽइव। धेनवः। ईशानम्। अस्य। जगतः। स्वःऽदृशम्। ईशानम्। इन्द्र। तस्थुषः ॥२२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 2

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Meaning
हे (शूर) पापाचरणों के हिंसक (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त परमात्मा ! (अस्य) इस (जगतः) जङ्गम के (ईशानम्) चेष्टा कराने और (तस्थुषः) स्थावर संसार के (ईशानम्) निर्माण करनेवाले (त्वा) आपको (स्वर्दृशम्) सुखपूर्वक देखने को (धेनवः) गौवें (अदुग्धाइव) दूधरहित हों जैसे, वैसे हम लोग (अभि, नोनुमः) सब ओर से निरन्तर नमते प्रणाम करते हैं ॥२२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्य ! यदि निरन्तर सुखेच्छा हो तो परमात्मा ही की आप लोग उपासना करें ॥२२॥
Subject
फिर इस जगत् का स्वामी कौन है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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