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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 21

104 Sukta
27 Mantra
7/32/21
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
न दु॑ष्टु॒ती मर्त्यो॑ विन्दते॒ वसु॒ न स्रेध॑न्तं र॒यिर्न॑शत्। सु॒शक्ति॒रिन्म॑घव॒न् तुभ्यं॒ माव॑ते दे॒ष्णं यत्पार्ये॑ दि॒वि ॥२१॥

न । दुः॒ऽस्तु॒ती । मर्त्यः॑ । वि॒न्द॒ते॒ । वसु॑ । न । स्रेध॑न्तम् । र॒यिः । न॒श॒त् । सु॒ऽशक्तिः॑ । इत् । म॒घ॒ऽव॒न् । तुभ्य॑म् । माऽव॑ते । दे॒ष्णम् । यत् । पार्ये॑ । दि॒वि ॥

Mantra without Swara
न दुष्टुती मर्त्यो विन्दते वसु न स्रेधन्तं रयिर्नशत्। सुशक्तिरिन्मघवन् तुभ्यं मावते देष्णं यत्पार्ये दिवि ॥

न। दुःऽस्तुती। मर्त्यः। विन्दते। वसु। न। स्रेधन्तम्। रयिः। नशत्। सुऽशक्तिः। इत्। मघऽवन्। तुभ्यम्। माऽवते। देष्णम्। यत्। पार्ये। दिवि ॥२१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 1

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Meaning
हे (मघवन्) परमपूजित धनयुक्त ! जैसे (मर्त्यः) मनुष्य (दुष्टुती) दुष्ट प्रशंसा से (वसु) धन को (न)(विन्दते) प्राप्त होता है (स्रेधन्तम्) और हिंसा करनेवाले मनुष्य को (रयिः) लक्ष्मी और (सुशक्तिः) सुन्दर शक्ति (इत्) ही (न) नहीं (नशत्) प्राप्त होती है इस प्रकार (मावते) मेरे समान (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (पार्ये) पालना वा पूर्णता करने के योग्य (दिवि) काम में (यत्) जो (देष्णम्) देने योग्य को न प्राप्त होता वह और को भी नहीं प्राप्त होता है ॥२१॥
Essence
जो अधर्माचरण से युक्त दुष्ट, हिंसक मनुष्य हैं उनको धन, राज्य, और उत्तम सामर्थ्यं नहीं प्राप्त होता है, इससे सबको न्याय के आचरण से ही धन खोजना चाहिये ॥२१॥
Subject
फिर मनुष्य धन की प्राप्ति के लिये क्या-क्या कर्म करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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