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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 2

104 Sukta
27 Mantra
7/32/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒मे हि ते॑ ब्रह्म॒कृतः॑ सु॒ते सचा॒ मधौ॒ न मक्ष॒ आस॑ते। इन्द्रे॒ कामं॑ जरि॒तारो॑ वसू॒यवो॒ रथे॒ न पाद॒मा द॑धुः ॥२॥

इ॒मे । हि । ते॒ । ब्र॒ह्म॒ऽकृतः॑ । सु॒ते । सचा॑ । मधौ॑ । न । मक्षः॑ । आस॑ते । इन्द्रे॑ । काम॑म् । ज॒रि॒तारः॑ । व॒सु॒ऽयवः॑ । रथे॑ । न । पाद॑म् । आ । द॒धुः॒ ॥

Mantra without Swara
इमे हि ते ब्रह्मकृतः सुते सचा मधौ न मक्ष आसते। इन्द्रे कामं जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः ॥

इमे। हि। ते। ब्रह्मऽकृतः। सुते। सचा। मधौ। न। मक्षः। आसते। इन्द्रे। कामम्। जरितारः। वसुऽयवः। रथे। न। पादम्। आ। दधुः ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (ते) आपके जो (इमे) यह (ब्रह्मकृतः) धन वा अन्न को सिद्ध करने (वसूयवः) धनों की कामना करने (जरितारः) और सत्य की स्तुति करनेवाले जन (सुते) उत्पन्न किये हुए (मधौ) मधुरादिगुणयुक्त स्थान में (मक्षः) मक्खियों के (न) समान (सचा) सम्बन्ध से (आसते) उपस्थित होते हैं (इन्द्रे) परमैश्वर्यवान् आप में (रथे) रमणीय यान में (पादम्) पैर जैसे धरें (न) वैसे (कामम्) कामना को (आ, दधुः) सब ओर से धारण करते हैं, वे (हि) ही सुखी होते हैं ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् राजा धर्मात्मा न्यायकारी हो तो इसके समीप में बहुत धार्मिक विद्वान् हों ॥२॥
Subject
फिर किसके समीप कौन बसें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥