Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 19

104 Sukta
27 Mantra
7/32/19
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
शिक्षे॑य॒मिन्म॑हय॒ते दि॒वेदि॑वे रा॒य आ कु॑हचि॒द्विदे॑। न॒हि त्वद॒न्यन्म॑घवन्न॒ आप्यं॒ वस्यो॒ अस्ति॑ पि॒ता च॒न ॥१९॥

शिक्षे॑यम् । इत् । म॒ह॒ऽय॒ते । दि॒वेऽदि॑वे । रा॒यः । आ । कु॒ह॒चि॒त्ऽविदे॑ । नहि । त्वत् । अ॒न्यत् । म॒घ॒ऽव॒न् । नः॒ । आप्य॑म् । वस्यः॑ । अस्ति॑ । पि॒ता । च॒न ॥

Mantra without Swara
शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे। नहि त्वदन्यन्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन ॥

शिक्षेयम्। इत्। महऽयते। दिवेऽदिवे। रायः। आ। कुहचित्ऽविदे। नहि। त्वत्। अन्यत्। मघऽवन्। नः। आप्यम्। वस्यः। अस्ति। पिता। चन ॥१९॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) पूजित धनयुक्त परमैश्वर्य्यवान् ! जो मैं (दिवेदिवे) प्रकाश प्रकाश के लिये (आ, कुहचिद्विदे) जो कहीं भी प्राप्त होता उस (महयते) महान् (राये) धन के लिये (शिक्षेयम्) अच्छी शिक्षा करूँ (त्वत्) तुम से (अन्यत्) और रक्षक को न जानूँ जो आप (पिता) पिता रक्षा करनेवाले (चन) भी हैं इस कारण सो आप (इत्) ही (नः) हमारे (वस्यः) अत्यन्त वश (आप्यम्) प्राप्त होने के योग्य हैं और (नहि) नहीं (अस्ति) है ॥१९॥
Essence
वे ही भृत्य उत्तम हैं, जो राजा वा स्वामी को छोड़ के दूसरे को =से नहीं जांचते =माँगते न विना दिये लेते, प्रतिदिन पुरुषार्थ से प्रजा की रक्षा कर और धनवृद्धि करना चाहते हैं ॥१९॥
Subject
फिर प्रजाजनों को क्या चाहने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥