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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 18

104 Sukta
27 Mantra
7/32/18
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यदि॑न्द्र॒ याव॑त॒स्त्वमे॒ताव॑द॒हमीशी॑य। स्तो॒तार॒मिद्दि॑धिषेय रदावसो॒ न पा॑प॒त्वाय॑ रासीय ॥१८॥

यत् । इ॒न्द्र॒ । याव॑तः । त्वम् । ए॒ताव॑त् । अ॒हम् । ईशी॑य । स्तो॒तार॑म् । इत् । दि॒धि॒षे॒य॒ । र॒द॒व॒सो॒ इति॑ रदऽवसो । न । पा॒प॒ऽत्वाय॑ । रा॒सी॒य॒ ॥

Mantra without Swara
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय। स्तोतारमिद्दिधिषेय रदावसो न पापत्वाय रासीय ॥

यत्। इन्द्र। यावतः। त्वम्। एतावत्। अहम्। ईशीय। स्तोतारम्। इत्। दिधिषेय। रदवसो इति रदऽवसो। न। पापऽत्वाय। रासीय ॥१८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (रदावसो) करोदनों में वसनेवाले (इन्द्र) परम ऐश्वर्य्य के देनेवाले ! (यत्) जो (त्वम्) आप (यावतः) जितने के ईश्वर हों (एतावत्) इतने का मैं (ईशीय) ईश्वर हूँ समर्थ होऊँ (स्तोतारम्) प्रशंसा करनेवाले को (इत्) ही (दिधिषेय) धारण करूँ और (पापत्वाय) पाप होने के लिए पदार्थ (न)(अहम्) मैं (रासीय) देऊँ ॥१८॥
Essence
हे राजा ! यदि आप हम लोगों की निरन्तर रक्षा करें तो हम आपके राज्य को रक्षा कर पापाचरण त्याग औरों को भी अधर्माचरण से अलग रख कर निरन्तर आनन्द करें ॥१८॥
Subject
फिर राजपुरुषों को क्या चाहना योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥