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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 17

104 Sukta
27 Mantra
7/32/17
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त्वं विश्व॑स्य धन॒दा अ॑सि श्रु॒तो य ईं॒ भव॑न्त्या॒जयः॑। तवा॒यं विश्वः॑ पुरुहूत॒ पार्थि॑वोऽव॒स्युर्नाम॑ भिक्षते ॥१७॥

त्वम् । विश्व॑स्य । ध॒न॒ऽदाः । अ॒सि॒ । श्रु॒तः । ये । ई॒म् । भव॑न्ति । आ॒जयः॑ । तव॑ । अ॒यम् । विश्वः॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । पार्थि॑वः । अ॒व॒स्युः । नाम॑ । भि॒क्ष॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं विश्वस्य धनदा असि श्रुतो य ईं भवन्त्याजयः। तवायं विश्वः पुरुहूत पार्थिवोऽवस्युर्नाम भिक्षते ॥

त्वम्। विश्वस्य। धनऽदाः। असि। श्रुतः। ये। ईम्। भवन्ति। आजयः। तव। अयम्। विश्वः। पुरुऽहूत। पार्थिवः। अवस्युः। नाम। भिक्षते ॥१७॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त स्वीकार किये हुए राजन् ! जो (श्रुतः) प्रसिद्ध कीर्तियुक्त (पार्थिवः) पृथिवी पर विदित (त्वम्) आप (विश्वस्य) समग्र राज्य के (धनदाः) धन देनेवाले (असि) हैं जिन (तव) आपका (अयम्) यह (विश्वः) सर्व (अवस्युः) अपने को रक्षा चाहनेवाला जन (नाम) प्रसिद्ध तुम से रक्षा को (भिक्षते) माँगता है (ये) जो (ईम्) सब ओर से (आजयः) संग्राम (भवन्ति) होते हैं, उनमें सब तुम्हारे सहाय को चाहते हैं, उनकी आप निरन्तर रक्षा करें ॥१७॥
Essence
जो राजा संग्राम में विजय करनेवालों को बहुत धन देता है, उसका पराजय कभी नहीं होता है, जो प्रजाजन रक्षा चाहें उसकी रक्षा जो निरन्तर करता है, वही पुण्यकीर्ति होता है ॥१७॥
Subject
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥