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Rigveda Mandal 7 / Sukta 32 / Mantra 10

104 Sukta
27 Mantra
7/32/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
नकिः॑ सु॒दासो॒ रथं॒ पर्या॑स॒ न री॑रमत्। इन्द्रो॒ यस्या॑वि॒ता यस्य॑ म॒रुतो॒ गम॒त्स गोम॑ति व्र॒जे ॥१०॥

नकिः॑ । सु॒ऽदासः॑ । रथ॑म् । परि॑ । आ॒स॒ । न । री॒र॒म॒त् । इन्द्रः॑ । यस्य॑ । अ॒वि॒ता । यस्य॑ । म॒रुतः॑ । गम॑त् । सः । गोऽम॑ति । व्र॒जे ॥

Mantra without Swara
नकिः सुदासो रथं पर्यास न रीरमत्। इन्द्रो यस्याविता यस्य मरुतो गमत्स गोमति व्रजे ॥

नकिः। सुऽदासः। रथम्। परि। आस। न। रीरमत्। इन्द्रः। यस्य। अविता। यस्य। मरुतः। गमत्। सः। गोऽमति। व्रजे ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 5

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Meaning
(यस्य) जिसका (इन्द्रः) दुष्टों को विदीर्ण करनेवाला (अविता) रक्षक (गमत्) जाता है वा (यस्य) जिसके (मरुतः) प्राण के मनुष्य रक्षा करनेवाले हैं जो (गोमति) जिसमें बहुत सी गौयें विद्यमान और (व्रजे) जिसमें जाते हैं उस स्थान में जाता है, जिसका दुष्टों का विदीर्ण करनेवाला रक्षक नहीं वह (सुदासः) श्रेष्ठ सेवक वा दोनोंवाला जन (रथम्) रथ को (नकिः) नहीं (परि, आस) सब ओर से अलग करता और (सः) वह (न) नहीं (रीरमत्) दूसरों को रमाता है ॥१०॥
Essence
यदि राजा प्रजा का रक्षक न हो तो किसी को सुख न हो ॥१०॥
Subject
फिर किसका किससे क्या हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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