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Rigveda Mandal 7 / Sukta 31 / Mantra 6

104 Sukta
12 Mantra
7/31/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं वर्मा॑सि स॒प्रथः॑ पुरोयो॒धश्च॑ वृत्रहन्। त्वया॒ प्रति॑ ब्रुवे यु॒जा ॥६॥

त्वम् । वर्म॑ । अ॒सि॒ । स॒ऽप्रथः॑ । पु॒रः॒ऽयो॒धः । च॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । त्वया॑ । प्रति॑ । ब्रु॒वे॒ । यु॒जा ॥

Mantra without Swara
त्वं वर्मासि सप्रथः पुरोयोधश्च वृत्रहन्। त्वया प्रति ब्रुवे युजा ॥

त्वम्। वर्म। असि। सऽप्रथः। पुरःऽयोधः। च। वृत्रऽहन्। त्वया। प्रति। ब्रुवे। युजा ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 6

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Meaning
हे (वृत्रहन्) दुष्टों के हननेवाला राजा ! जो (त्वम्) आप (योधः) युद्ध करनेवाले (सप्रथः) प्रख्याति प्रशंसा के सहित (वर्म, च) और कवच के समान (असि) हैं जिस (युजो) न्याय से युक्त होनेवाले (त्वया) आपके साथ मैं (प्रति, ब्रुवे) प्रत्यक्ष उपदेश करता हूँ सो आप (पुरः) आगे रक्षा करनेवाले हूजिये ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो राजा सत्कीर्ति, सुशील, निरभिमान, विद्वान् हो तो उसके प्रति सब सत्य बोलें और वह सुनकर प्रसन्न हो ॥६॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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