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Rigveda Mandal 7 / Sukta 31 / Mantra 2

104 Sukta
12 Mantra
7/31/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शंसेदु॒क्थं सु॒दान॑व उ॒त द्यु॒क्षं यथा॒ नरः॑। च॒कृ॒मा स॒त्यरा॑धसे ॥२॥

शंस॑ । इत् । उ॒क्थम् । सु॒ऽदान॑वे । उ॒त । द्यु॒क्षम् । यथा॑ । नरः॑ । च॒कृ॒म । स॒त्यऽरा॑धसे ॥

Mantra without Swara
शंसेदुक्थं सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः। चकृमा सत्यराधसे ॥

शंस। इत्। उक्थम्। सुऽदानवे। उत। द्युक्षम्। यथा। नरः। चकृम। सत्यऽराधसे ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! (यथा) जैसे (नरः) मनुष्य हम लोग (सुदानवे) उत्तम दान के लिये वा (सत्यराधसे) सत्य जिसका धन है उसके लिये (द्युक्षम्) मनोहर (उक्थम्) प्रशंसनीय काम (चकृम) करें, वैसे आप (इत्) ही (शंसे) प्रशंसा करें (उत) ही ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे विद्वानो ! जिसका धर्म से उत्पन्न हुआ धन है और सुपात्रों के लिये दान वर्त्तमान है, उसी को उत्तम जानो ॥२॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥