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Rigveda Mandal 7 / Sukta 31 / Mantra 11

104 Sukta
12 Mantra
7/31/11
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उ॒रु॒व्यच॑से म॒हिने॑ सुवृ॒क्तिमिन्द्रा॑य॒ ब्रह्म॑ जनयन्त॒ विप्राः॑। तस्य॑ व्र॒तानि॒ न मि॑नन्ति॒ धीराः॑ ॥११॥

उ॒रु॒ऽव्यच॑से । म॒हिने॑ । सु॒ऽवृ॒क्तिम् । इन्द्रा॑य । ब्रह्म॑ । ज॒न॒य॒न्त॒ । विप्राः॑ । तस्य॑ । व्र॒तानि॑ । न । मि॒न॒न्ति॒ । धीराः॑ ॥

Mantra without Swara
उरुव्यचसे महिने सुवृक्तिमिन्द्राय ब्रह्म जनयन्त विप्राः। तस्य व्रतानि न मिनन्ति धीराः ॥

उरुऽव्यचसे। महिने। सुऽवृक्तिम्। इन्द्राय। ब्रह्म। जनयन्त। विप्राः। तस्य। व्रतानि। न। मिनन्ति। धीराः ॥११॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे (धीराः) ध्यानवान् (विप्राः) विद्वानो ! आप लोग (उरुव्यचसे) बहुत विद्याओं में व्यापक (महिने) सत्कार करने योग्य (इन्द्राय) परमैश्वर्यवान् के लिये (सुवृक्तिम्) उत्तमता से अन्याय को वर्जते हैं जिससे उसको और (ब्रह्म) धन वा अन्न को (जनयन्त) उत्पन्न करते हैं (तस्य) उनके (व्रतानि) सत्य भाषण आदि कर्म कोई (न) नहीं (मिनन्ति) नष्ट करते हैं ॥११॥
Essence
जो राजा के लिये बहुत धन उत्पन्न करते और असत्य आचरण को निवृत्त कर सत्य आचरण प्रसिद्ध करते हैं, वे पूज्य होते हैं ॥११॥
Subject
फिर वे विद्वान् जन क्या उत्पन्न करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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