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Rigveda Mandal 7 / Sukta 31 / Mantra 10

104 Sukta
12 Mantra
7/31/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र वो॑ म॒हे म॑हि॒वृधे॑ भरध्वं॒ प्रचे॑तसे॒ प्र सु॑म॒तिं कृ॑णुध्वम्। विशः॑ पू॒र्वीः प्र च॑रा चर्षणि॒प्राः ॥१०॥

प्र । वः॒ । म॒हे । म॒हि॒ऽवृधे॑ । भ॒र॒ध्व॒म् । प्रऽचे॑तसे । प्र । सु॒ऽम॒तिम् । कृ॒णु॒ध्व॒म् । विशः॑ । पू॒र्वीः । प्र । च॒र॒ । च॒र्ष॒णि॒ऽप्राः ॥

Mantra without Swara
प्र वो महे महिवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम्। विशः पूर्वीः प्र चरा चर्षणिप्राः ॥

प्र। वः। महे। महिऽवृधे। भरध्वम्। प्रऽचेतसे। प्र। सुऽमतिम्। कृणुध्वम्। विशः। पूर्वीः। प्र। चर। चर्षणिऽप्राः ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वानो ! जैसे हम लोग (वः) तम्हारे लिये उत्तम पदार्थों को दें, वैसे तुम हम लोगों के (महे) महान् व्यवहार के लिये (महिवृधे) तथा बड़ों के बढ़ने और (प्रचेतसे) उत्तम प्रज्ञा रखनेवाले के लिये (सुमतिम्) सुन्दर मति को (प्र, भरध्वम्) उत्तमता से धारण करो हम लोगों को (पूर्वीः) प्राचीन पिता पितामहादिकों से प्राप्त (विशः) प्रजाजनों को (प्र, कृणुध्वम्) विद्वान् अच्छे प्रकार करो (चर्षणिप्राः) जो मनुष्यों को व्याप्त होता वह राजा आप न्याय में (प्र, चर) प्रचार करो ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन तुम लोगों के लिये शुभगुण और पुष्कल ऐश्वर्य विधान करते हैं, वैसे तुम इनके लिये श्रेष्ठ नीति धारण करो ॥१०॥
Subject
फिर राजप्रजाजन परस्पर क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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