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Rigveda Mandal 7 / Sukta 30 / Mantra 4

104 Sukta
5 Mantra
7/30/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व॒यं ते त॑ इन्द्र॒ ये च॑ देव॒ स्तव॑न्त शूर॒ दद॑तो म॒घानि॑। यच्छा॑ सू॒रिभ्य॑ उप॒मं वरू॑थं स्वा॒भुवो॑ जर॒णाम॑श्नवन्त ॥४॥

व॒यम् । ते । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । ये । च॒ । दे॒व॒ । स्तव॑न्त । शू॒र॒ । दद॑तः । म॒घानि॑ । यच्छ॑ । सू॒रिऽभ्यः॑ । उ॒प॒ऽमम् । वरू॑थम् । सु॒ऽआ॒भुवः॑ । ज॒र॒णाम् । अ॒श्न॒व॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
वयं ते त इन्द्र ये च देव स्तवन्त शूर ददतो मघानि। यच्छा सूरिभ्य उपमं वरूथं स्वाभुवो जरणामश्नवन्त ॥

वयम्। ते। ते। इन्द्र। ये। च। देव। स्तवन्त। शूर। ददतः। मघानि। यच्छ। सूरिऽभ्यः। उपऽमम्। वरूथम्। सुऽआभुवः। जरणाम्। अश्नवन्त ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) शत्रुओं के मारने और (इन्द्र) परम ऐश्वर्य देनेवाले (देव) विद्वान् जन ! (ये) जो (सूरिभ्यः) विद्वानों के लिये (मघानि) धनों को (ददतः) देते हुए (ते) आपके (उपमम्) जिससे उपमा दी जाती है उस कर्म की (स्तवन्त) प्रशंसा करते हैं (च) और जो (स्वाभुवः) अच्छे प्रकार सब ओर से उत्तम होते हैं वे जन (वरूथम्) घर और (जरणाम्) जरावस्था को (अश्नवन्त) प्राप्त होते हैं (ते) वे (वयम्) हम लोग आपकी प्रशंसा करें आप हम लोगों के लिये धनों को (यच्छा) देओ ॥४॥
Essence
जो राजा अच्छी परीक्षा कर विद्वानों के लिये धन आदि दे और सत्कार कर इन विद्या अवस्था वृद्ध धार्मिक जनों को सेना आदि के अधिकारों में नियुक्त करता है, उसकी सर्वदा जीत और प्रशंसा होती है ॥४॥
Subject
फिर किसकी उत्तम जीत और प्रशंसा होती है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥