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Rigveda Mandal 7 / Sukta 30 / Mantra 3

104 Sukta
5 Mantra
7/30/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अहा॒ यदि॑न्द्र सु॒दिना॑ व्यु॒च्छान्दधो॒ यत्के॒तुमु॑प॒मं स॒मत्सु॑। न्य१॒॑ग्निः सी॑द॒दसु॑रो॒ न होता॑ हुवा॒नो अत्र॑ सु॒भगा॑य दे॒वान् ॥३॥

अहा॑ । यत् । इ॒न्द्र॒ । सु॒ऽदिना॑ । वि॒ऽउ॒च्छान् । दधः॑ । यत् । के॒तुम् । उ॒प॒ऽमम् । स॒मत्ऽसु॑ । नि । अ॒ग्निः । सी॒द॒त् । असु॑रः । न । होता॑ । हु॒वा॒नः । अत्र॑ । सु॒ऽभगा॑य । दे॒वान् ॥

Mantra without Swara
अहा यदिन्द्र सुदिना व्युच्छान्दधो यत्केतुमुपमं समत्सु। न्य१ग्निः सीददसुरो न होता हुवानो अत्र सुभगाय देवान् ॥

अहा। यत्। इन्द्र। सुऽदिना। विऽउच्छान्। दधः। यत्। केतुम्। उपऽमम्। समत्ऽसु। नि। अग्निः। सीदत्। असुरः। न। होता। हुवानः। अत्र। सुऽभगाय। देवान् ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्त्तमान ! (अत्र) इन (समत्सु) संग्रामों में (यत्) जिन (देवान्) विद्वानों को (सुभगाय) सुन्दर ऐश्वर्य्य के लिये (असुरः) जो प्राणों में रमता है उस (होता) होम करनेवाले के (न) समान शत्रुओं को युद्ध की आग में (हुवानः) होमते अर्थात् उनको स्पर्द्धा से चाहते हुए (अग्निः) अग्नि के समान आप (नि, सीदत्) निरन्तर स्थिर होते हो और (यत्) जिस (उपमम्) उपमा दिलानेवाली (केतुम्) बुद्धि के विषय को (अहा) साधारण दिन वा (सुदिना) सुख करनेवाले दिनों दिन (व्युच्छान्) विविध प्रकार से बसाये हुए विद्वानों को संग्रामों में (दधः) धारण करो सो आप जीत सकते हो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। वही राजा जीतता है, जो उत्तम शूरवीर विद्वानों को अपनी सेना में सत्कार का रक्खे जैसे होम करनेवाली अग्नि में साकल्य होमता है, वैसे शस्त्र और अस्त्रों की अग्नि में शत्रुओं को होमे ॥३॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होता हुआ क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥