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Rigveda Mandal 7 / Sukta 30 / Mantra 2

104 Sukta
5 Mantra
7/30/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हव॑न्त उ त्वा॒ हव्यं॒ विवा॑चि त॒नूषु॒ शूराः॒ सूर्य॑स्य सा॒तौ। त्वं विश्वे॑षु॒ सेन्यो॒ जने॑षु॒ त्वं वृ॒त्राणि॑ रन्धया सु॒हन्तु॑ ॥२॥

हव॑न्ते । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । हव्य॑म् । विऽवा॑चि । त॒नूषु॑ । शूराः॑ । सूर्य॑स्य । सा॒तौ । त्वम् । विश्वे॑षु । सेन्यः॑ । जने॑षु । त्वम् । वृ॒त्राणि॑ । र॒न्ध॒य॒ । सु॒ऽहन्तु॑ ॥

Mantra without Swara
हवन्त उ त्वा हव्यं विवाचि तनूषु शूराः सूर्यस्य सातौ। त्वं विश्वेषु सेन्यो जनेषु त्वं वृत्राणि रन्धया सुहन्तु ॥

हवन्ते। ऊँ इति। त्वा। हव्यम्। विऽवाचि। तनूषु। शूराः। सूर्यस्य। सातौ। त्वम्। विश्वेषु। सेन्यः। जनेषु। त्वम्। वृत्राणि। रन्धय। सुऽहन्तु ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे परमैश्वर्ययुक्त ! जो (त्वम्) आप (विश्वेषु) सब (जनेषु) मनुष्यों में (सेन्यः) सेना में उत्तम होते हुए (वृत्राणि) शत्रु सैन्य जन आदि को (रन्धय) मारो (त्वम्) आप जैसे वीर होता हुआ जन शत्रुओं को अच्छे प्रकार हने, वैसे उनको आप (सुहन्तु) मारो (सूर्यस्य) सवितृमण्डल की किरणों के समान राज्य के बीच और (तनूषु) फैला है बल जिनमें उन शरीरों में प्रकाशमान (शूराः) शत्रुओं के मारनेवाले जन जिन (हव्यम्) बुलाने योग्य (त्वा) आपको (सातौ) संविभाग में अर्थात् बाँट चूँट में वा (विवाचि, उ) विरुद्ध वाणी जिसमें होती है उस संग्राम में (हवन्ते) बुलावें उनको आप बुलावें ॥२॥
Essence
वही राजा सर्वप्रिय होता है, जो न्याय से प्रजा की अच्छी पालना कर संग्राम जीतता है ॥२॥
Subject
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥