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Rigveda Mandal 7 / Sukta 3 / Mantra 9

104 Sukta
10 Mantra
7/3/9
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
निर्यत्पू॒तेव॒ स्वधि॑तिः॒ शुचि॒र्गात्स्वया॑ कृ॒पा त॒न्वा॒३॒॑ रोच॑मानः। आ यो मा॒त्रोरु॒शेन्यो॒ जनि॑ष्ट देव॒यज्या॑य सु॒क्रतुः॑ पाव॒कः ॥९॥

निः । यत् । पू॒ताऽइ॑व । स्वऽधि॑तिः । शुचिः॑ । गात् । स्वया॑ । कृ॒पा । त॒न्वा॑ । रोच॑मानः । आ । यः । मा॒त्रोः । उ॒शेन्यः॑ । जनि॑ष्ट । दे॒व॒ऽयज्या॑य । सु॒ऽक्रतुः॑ । पा॒व॒कः ॥

Mantra without Swara
निर्यत्पूतेव स्वधितिः शुचिर्गात्स्वया कृपा तन्वा३ रोचमानः। आ यो मात्रोरुशेन्यो जनिष्ट देवयज्याय सुक्रतुः पावकः ॥

निः। यत्। पूताऽइव। स्वऽधितिः। शुचिः। गात्। स्वया। कृपा। तन्वा। रोचमानः। आ। यः। मात्रोः। उशेन्यः। जनिष्ट। देवऽयज्याय। सुऽक्रतुः। पावकः ॥९॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (पूतेव) पवित्रता के तुल्य (स्वधितिः) वज्र (शुचिः) पवित्र पुरुष (नि, गात्) निरन्तर प्राप्त होता है (यः) जो (स्वया) अपनी (कृपा) कृपा से (तन्वा) शरीर करके (रोचमानः) प्रकाशमान (मात्रोः) जननी और धात्री में (उशेन्यः) कामना के योग्य (पावकः) अग्नि के तुल्य प्रकाशित यशवाले (सुक्रतुः) उत्तम प्रज्ञावाले (देवयज्याय) बुद्धिमानों के समागम के लिये (आ, जनिष्ट) प्रकट होता है, वही इस जगत् में प्रशंसा के योग्य होवे ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जिसको वज्र के समान दृढ़, अग्नि के समान पवित्र, कृपालु, दर्शनीय शरीर, विद्वान् धर्मात्मा जानो, उसी को इनमें से राजा मानो ॥९॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसा राजा मानना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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