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Rigveda Mandal 7 / Sukta 3 / Mantra 6

104 Sukta
10 Mantra
7/3/6
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒सं॒दृक्ते॑ स्वनीक॒ प्रती॑कं॒ वि यद्रु॒क्मो न रोच॑स उपा॒के। दि॒वो न ते॑ तन्य॒तुरे॑ति॒ शुष्म॑श्चि॒त्रो न सूरः॒ प्रति॑ चक्षि भा॒नुम् ॥६॥

सु॒ऽस॒न्दृक् । ते॒ । सु॒ऽअ॒नी॒क॒ । प्रती॑कम् । वि । यत् । रु॒क्मः । न । रोच॑से । उ॒पा॒के । दि॒वः । न । ते॒ । त॒न्य॒तुः । ए॒ति॒ । शुष्मः॑ । चि॒त्रः । न । सूरः॑ । प्रति॑ । च॒क्षि॒ भा॒नुम् ॥

Mantra without Swara
सुसंदृक्ते स्वनीक प्रतीकं वि यद्रुक्मो न रोचस उपाके। दिवो न ते तन्यतुरेति शुष्मश्चित्रो न सूरः प्रति चक्षि भानुम् ॥

सुऽसन्दृक्। ते। सुऽअनीक। प्रतीकम्। वि। यत्। रुक्मः। न। रोचसे। उपाके। दिवः। न। ते। तन्यतुः। एति। शुष्मः। चित्रः। न। सूरः। प्रति। चक्षि भानुम् ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 1

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Meaning
हे (स्वनीक) सुन्दर सेनावाले सेनापते ! जिस (ते) आपका (यत्) जो (प्रतीकम्) विजय का निश्चय करानेवाले (रुक्मः) प्रकाशमान सूर्य्य के (न) तुल्य है जो (उपाके) समीप में (वि, रोचसे) विशेष कर रुचिकारक होते हो। जिस (ते) तुम्हारा (दिवः, न) सूर्य्य के तुल्य (सुसन्दृक्) अच्छे प्रकार देखने का साधन (तन्यतुः) विद्युत् विजय प्रतितिकारक नियम को (एति) प्राप्त होता है, उसका (शुष्मः) बलयुक्त (चित्रः) आश्चर्यस्वरूप (सूरः) सूर्य (न) जैसे, वैसे मैं (भानुम्) प्रकाशयुक्त आपके (प्रति) (चक्षि) कहूँ ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे राजन् ! यदि आप विद्युद् विद्या को जानें तो सूर्य्य के तुल्य सुन्दर सेनादिकों से प्रकाशित हुए सर्वत्र विजय, कीर्ति और राजाओं में सुशोभित होवें ॥६॥
Subject
फिर वह विद्युत् अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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