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Rigveda Mandal 7 / Sukta 3 / Mantra 5

104 Sukta
10 Mantra
7/3/5
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तमिद्दो॒षा तमु॒षसि॒ यवि॑ष्ठम॒ग्निमत्यं॒ न म॑र्जयन्त॒ नरः॑। नि॒शिशा॑ना॒ अति॑थिमस्य॒ योनौ॑ दी॒दाय॑ शो॒चिराहु॑तस्य॒ वृष्णः॑ ॥५॥

तम् । इत् । दो॒षा । तम् । उ॒षसि॑ । यवि॑ष्ठम् । अ॒ग्निम् । अत्य॑म् । न । म॒र्ज॒य॒न्त॒ । नरः॑ । नि॒ऽशिशा॑नाः । अति॑थिम् । अ॒स्य॒ । योनौ॑ । दी॒दाय॑ । शो॒चिः । आऽहु॑तस्य । वृष्णः॑ ॥

Mantra without Swara
तमिद्दोषा तमुषसि यविष्ठमग्निमत्यं न मर्जयन्त नरः। निशिशाना अतिथिमस्य योनौ दीदाय शोचिराहुतस्य वृष्णः ॥

तम्। इत्। दोषा। तम्। उषसि। यविष्ठम्। अग्निम्। अत्यम्। न। मर्जयन्त। नरः। निऽशिशानाः। अतिथिम्। अस्य। योनौ। दीदाय। शोचिः। आऽहुतस्य। वृष्णः ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) नायक मनुष्यो ! जो (निशिशानाः) निरन्तर तीक्ष्णता पूर्वक कार्य करते हुए आप (तम्) उस विद्युत् अग्नि को (दोषा) रात्रि में (तम्) उसको (उषसि) दिन में (अत्यम्) घ़ोडे को (न) जैसे, वैसे (यविष्ठम्) अत्यन्त जवान के तुल्य (अग्निम्) विद्युत् अग्नि को (मर्जयन्त) घर्षण आदि से शुद्ध करो (अस्य) इस (आहुतस्य) अभीष्ट सिद्धि के लिये संग्रह किये (वृष्णः) वर्षा के हेतु अग्नि के (योनौ) कारण में (अतिथिम्) अतिथि के तुल्य सेवने योग्य (शोचिः) दीप्तियुक्त विद्युत् को (दीदाय) प्रकाशित (इत्) ही कीजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो तीव्र घर्षणादिकों से दिन-रात विद्युत् अग्नि को प्रकट करते हैं, वे जैसे घोड़े से, वैसे शीघ्र स्थानान्तर के जाने को समर्थ होते हैं ॥५॥
Subject
फिर वह विद्युत् कैसे उत्पन्न करनी चाहिये और वह क्या करती है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥