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Rigveda Mandal 7 / Sukta 3 / Mantra 1

104 Sukta
10 Mantra
7/3/1
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्निं वो॑ दे॒वम॒ग्निभिः॑ स॒जोषा॒ यजि॑ष्ठं दू॒तम॑ध्व॒रे कृ॑णुध्वम्। यो मर्त्ये॑षु॒ निध्रु॑विर्ऋ॒तावा॒ तपु॑र्मूर्धा घृ॒तान्नः॑ पाव॒कः ॥१॥

अ॒ग्निम् । वः॒ । दे॒वम् । अ॒ग्निऽभिः॑ । स॒ऽजोषाः॑ । यजि॑ष्ठम् । दू॒तम् । अ॒ध्व॒रे । कृ॒णु॒ध्व॒म् । यः । मर्त्ये॑षु । निऽध्रु॑विः । ऋ॒तऽवा॑ । तपुः॑ऽमूर्धा । घृ॒तऽअ॑न्नः । पा॒व॒कः ॥

Mantra without Swara
अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा यजिष्ठं दूतमध्वरे कृणुध्वम्। यो मर्त्येषु निध्रुविर्ऋतावा तपुर्मूर्धा घृतान्नः पावकः ॥

अग्निम्। वः। देवम्। अग्निऽभिः। सऽजोषाः। यजिष्ठम्। दूतम्। अध्वरे। कृणुध्वम्। यः। मर्त्येषु। निऽध्रुविः। ऋतऽवा। तपुःऽमूर्धा। घृतऽअन्नः। पावकः ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (वः) तुम्हारा (सजोषाः) एक सी प्रीति को सेवनेवाला (मर्त्येषु) मरणधर्म सहित मनुष्यादिकों में (निध्रुविः) निरन्तर स्थित (ऋतावा) सत्य वा जल का विभाग करनेवाला (तपुर्मूर्धा) शिर के तुल्य उत्कृष्ट वा उत्तम जिसका ताप है (घृतान्नः) अन्न के तुल्य प्रकाशित जिसका घृत है (पावकः) जो पवित्र करनेवाला है उस (अध्वरे) सूर्य आदि के साथ (यजिष्ठम्) अत्यन्त संगति करनेवाले (दूतम्) दूत के तुल्य तार द्वारा शीघ्र समाचार पहुँचानेवाले (अग्निम्, देवम्) उत्तम गुण, कर्म और स्वभाव युक्त अग्नि को तुम लोग (कृणुध्वम्) प्रकट करो ॥१॥
Essence
हे विद्वानो ! जो विद्युत् सर्वत्र स्थित, विभाग करनेवाली प्रकाशित गुणों से युक्त साधनों से प्रकट हुई वर्त्तमान है, उसी को तुम लोग दूत के तुल्य बना कर युद्धादि कार्य्यों को सिद्ध करो ॥१॥
Subject
अब सातवें मण्डल के तृतीय सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्युत् कैसी है, इस विषय को कहते हैं।