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Rigveda Mandal 7 / Sukta 29 / Mantra 3

104 Sukta
5 Mantra
7/29/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
का ते॑ अ॒स्त्यरं॑कृतिः सू॒क्तैः क॒दा नू॒नं ते॑ मघवन्दाशेम। विश्वा॑ म॒तीरा त॑तने त्वा॒याधा॑ म इन्द्र शृणवो॒ हवे॒मा ॥३॥

का । ते॒ । अ॒स्ति॒ । अर॑म्ऽकृतिः । सु॒ऽउ॒क्तैः । क॒दा । नू॒नम् । ते॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । दा॒शे॒म॒ । विश्वाः॑ । म॒तीः । आ । त॒त॒ने॒ । त्वा॒ऽया । अध॑ । मे॒ । इ॒न्द्र॒ । शृ॒ण॒वः॒ । हवा॑ । इ॒मा ॥

Mantra without Swara
का ते अस्त्यरंकृतिः सूक्तैः कदा नूनं ते मघवन्दाशेम। विश्वा मतीरा ततने त्वायाधा म इन्द्र शृणवो हवेमा ॥

का। ते। अस्ति। अरम्ऽकृतिः। सुऽउक्तैः। कदा। नूनम्। ते। मघऽवन्। दाशेम। विश्वाः। मतीः। आ। ततने। त्वाऽया। अध। मे। इन्द्र। शृणवः। हवा। इमा ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) बहुधनयुक्त (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य्य सम्पन्न ! (का) कौन (ते) आपका (अरङ्कृतिः) अलङ्कार (अस्ति) है (सूक्तैः) और अच्छे प्रकार कहा है अर्थ जिनका उन वेद-वचनों से (ते) आपको (नूनम्) निश्चित (विश्वाः) सब (मतीः) बुद्धियों को हम लोग (कदा) कब (दाशेम) देवें (त्वाया) आपकी बुद्धि से मैं (आ, ततने) विस्तार करूँ (अध) इसके अनन्तर आप (मे) मेरे (इमा) इन (हवा) सुने वाक्यों को (शृणवः) सुनो ॥३॥
Essence
वे अध्यापक श्रेष्ठ होते हैं जो इन अपने विद्यार्थियों को कब विद्वान् करें ऐसी इच्छा करते हैं और सब के लिये सत्य उत्तम ज्ञानों को देते हैं और वे ही विद्यार्थी श्रेष्ठ हैं जो उत्साह से अपने पढ़े हुए की उत्तम परीक्षा देते हैं तथा वे ही परीक्षा करनेवाले श्रेष्ठ हैं जो परीक्षा में किसी का पक्षपात नहीं करते हैं ॥३॥
Subject
कौन पढ़ाने और पढ़नेवाले प्रशंसा करने योग्य हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥