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Rigveda Mandal 7 / Sukta 29 / Mantra 2

104 Sukta
5 Mantra
7/29/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ब्रह्म॑न्वीर॒ ब्रह्म॑कृतिं जुषा॒णो॑ऽर्वाची॒नो हरि॑भिर्याहि॒ तूय॑म्। अ॒स्मिन्नू॒ षु सव॑ने मादय॒स्वोप॒ ब्रह्मा॑णि शृणव इ॒मा नः॑ ॥२॥

ब्रह्म॑न् । वी॒र॒ । ब्रह्म॑ऽकृतिम् । जु॒षा॒णः । अ॒र्वा॒ची॒नः । हरि॑ऽभिः । या॒हि॒ । तूय॑म् । अ॒स्मिन् । ऊँ॒ इति॑ । सु । सव॑ने । मा॒द॒य॒स्व॒ । उप॑ । ब्रह्मा॑णि । शृ॒ण॒वः॒ । इ॒मा । नः॒ ॥

Mantra without Swara
ब्रह्मन्वीर ब्रह्मकृतिं जुषाणोऽर्वाचीनो हरिभिर्याहि तूयम्। अस्मिन्नू षु सवने मादयस्वोप ब्रह्माणि शृणव इमा नः ॥

ब्रह्मन्। वीर। ब्रह्मऽकृतिम्। जुषाणः। अर्वाचीनः। हरिऽभिः। याहि। तूयम्। अस्मिन्। ऊँ इति। सु। सवने। मादयस्व। उप। ब्रह्माणि। शृणवः। इमा। नः ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ब्रह्मन्) चार वेदों के जाननेवाले (वीर) समस्त शुभगुणों में व्याप्त ! (ब्रह्मकृतिम्) परमेश्वर की कृति जो संसार इसको (जुषाणः) सेवते हुए (अर्वाचीनः) वर्त्तमान समय में प्रसिद्ध हुए आप (हरिभिः) अच्छे गुणों के आकर्षण करनेवाले मनुष्यों के साथ (तूयम्) शीघ्र (याहि) जाओ (अस्मिन्) इस (सवने) सवन में अर्थात् जिस कर्म से पदार्थों को सिद्ध करते हैं उसमें हम लोगों को (मादयस्व) आनन्दित कीजिये (नः) हमारे (इमा) इन (ब्रह्माणि) पढ़े हुए वेदवचनों को (सु, उ, उप, शृणवः) उत्तम प्रकार तर्क-वितर्क से समीप में सुनिये ॥२॥
Essence
हे विद्वन् ! आप सृष्टि के क्रम को जान कर हमको जतलाओ, इसमें पढ़ाना पढ़ना काम और पढ़े हुए की परीक्षा करो और विद्यादान से शीघ्र प्रमोद देओ ॥२॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥