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Rigveda Mandal 7 / Sukta 29 / Mantra 1

104 Sukta
5 Mantra
7/29/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒यं सोम॑ इन्द्र॒ तुभ्यं॑ सुन्व॒ आ तु प्र या॑हि हरिव॒स्तदो॑काः। पिबा॒ त्व१॒॑स्य सुषु॑तस्य॒ चारो॒र्ददो॑ म॒घानि॑ मघवन्निया॒नः ॥१॥

अ॒यम् । सोमः॑ । इ॒न्द्र॒ । तुभ्य॑म् । सु॒न्वे॒ । आ । तु । प्र । या॒हि॒ । ह॒रि॒ऽवः॒ । तत्ऽओ॑काः । पिब॑ । तु । अ॒स्य । सुऽसु॑तस्य । चारोः॑ । ददः॑ । म॒घानि॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । इ॒या॒नः ॥

Mantra without Swara
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्व आ तु प्र याहि हरिवस्तदोकाः। पिबा त्व१स्य सुषुतस्य चारोर्ददो मघानि मघवन्नियानः ॥

अयम्। सोमः। इन्द्र। तुभ्यम्। सुन्वे। आ। तु। प्र। याहि। हरिऽवः। तत्ऽओकाः। पिब। तु। अस्य। सुऽसुतस्य। चारोः। ददः। मघानि। मघऽवन्। इयानः ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) बहुधन और (हरिवः) प्रशस्त मनुष्ययुक्त (इन्द्र) दारिद्र्य विनाशनेवाले ! जो (अयम्) यह (सोमः) ओषधियों का रस है जिसको मैं (तु) तो (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (प्र, सुन्वे) खींचता हूँ उसको तुम (पिब) पीओ (तदोकाः) वह श्रेष्ठ गृह जिसका है ऐसे होते हुए (आ, याहि) आओ (अस्य) इस (सुषुतस्य) सुन्दर निर्माण किये और (चारोः) सुन्दर जन के (मघानि) धनों को (इयानः) प्राप्त होते हुए हमारे लिये (ददः) देओ ॥१॥
Essence
जो मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से उत्पन्न किये हुए सर्वरोग हरने और बुद्धि बल के देनेवाले, बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को पीते हैं, वे सुख और ऐश्वर्य पाते हैं ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले उनतीसवें सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में किसको कौन बनाना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥