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Rigveda Mandal 7 / Sukta 28 / Mantra 4

104 Sukta
5 Mantra
7/28/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒भिर्न॑ इ॒न्द्राह॑भिर्दशस्य दुर्मि॒त्रासो॒ हि क्षि॒तयः॒ पव॑न्ते। प्रति॒ यच्चष्टे॒ अनृ॑तमने॒ना अव॑ द्वि॒ता वरु॑णो मा॒यी नः॑ सात् ॥४॥

ए॒भिः । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । अह॑ऽभिः । द॒श॒स्य॒ । दुः॒ऽमि॒त्रासः॑ । हि । क्षि॒तयः॑ । पव॑न्ते । प्रति॑ । यत् । च॒ष्टे॒ । अनृ॑तम् । अ॒ने॒नाः । अव॑ । द्वि॒ता । वरु॑णः । मा॒यी । नः॒ । सा॒त् ॥

Mantra without Swara
एभिर्न इन्द्राहभिर्दशस्य दुर्मित्रासो हि क्षितयः पवन्ते। प्रति यच्चष्टे अनृतमनेना अव द्विता वरुणो मायी नः सात् ॥

एभिः। नः। इन्द्र। अहऽभिः। दशस्य। दुःऽमित्रासः। हि। क्षितयः। पवन्ते। प्रति। यत्। चष्टे। अनृतम्। अनेनाः। अव। द्विता। वरुणः। मायी। नः। सात् ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) दोषों के विदीर्ण करनेवाले ! जो (अनृतम्) झूँठ कहते हैं वे (दुर्मित्रासः) दुष्ट मित्र हैं और जो (हि) निश्चित (क्षितयः) मनुष्य सत्य कहते हैं वे (एभिः) इन वर्त्तमान (अहभिः) दिवसों के साथ (पवन्ते) पवित्र होते हैं इनके साथ आप (नः) हम लोगों को (दशस्य) दीजिये और (अनेनाः) निष्पाप आप (यत्) जिसके (प्रति) प्रति (चष्टे) कहते हैं (द्विता) तथा दो का होना (वरुणः) जो स्वीकार करने योग्य वह और (मायी) उत्तम बुद्धिमान् होता हुआ जन (नः) हम लोगों को सत्य का (अव, सात्) निश्चय कर देवे ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो यहाँ झूँठ कहते हैं, वे अधर्मात्मा पुरुष हैं और जो सत्य कहते हैं वे धर्मात्मा हैं, ऐसा निश्चय करो ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥