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Rigveda Mandal 7 / Sukta 28 / Mantra 3

104 Sukta
5 Mantra
7/28/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तव॒ प्रणी॑तीन्द्र॒ जोहु॑वाना॒न्त्सं यन्नॄन्न रोद॑सी नि॒नेथ॑। म॒हे क्ष॒त्राय॒ शव॑से॒ हि ज॒ज्ञेऽतू॑तुजिं चि॒त्तूतु॑जिरशिश्नत् ॥३॥

तव॑ । प्रऽनी॑ती । इ॒न्द्र॒ । जोहु॑वानान् । सम् । यत् । नॄन् । न । रोद॑सी॒ इति॑ । नि॒नेथ॑ । म॒हे । क्ष॒त्राय॑ । शव॑से । हि । ज॒ज्ञे । अतू॑तुजिम् । चि॒त् । तूतु॑जिः । अ॒शि॒श्न॒त् ॥

Mantra without Swara
तव प्रणीतीन्द्र जोहुवानान्त्सं यन्नॄन्न रोदसी निनेथ। महे क्षत्राय शवसे हि जज्ञेऽतूतुजिं चित्तूतुजिरशिश्नत् ॥

तव। प्रऽनीती। इन्द्र। जोहुवानान्। सम्। यत्। नॄन्। न। रोदसी इति। निनेथ। महे। क्षत्राय। शवसे। हि। जज्ञे। अतूतुजिम्। चित्। तूतुजिः। अशिश्नत् ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त ! (हि) जिस कारण आप (महे) महान् (क्षत्राय) राज्य धन और (शवसे) बल के लिये (जज्ञे) उत्पन्न होते (तूतुजिः) बलवान् होते हुए हिंसक लोगों को (चित्) भी आप (अशिश्नत्) मारते और (यत्) जो (जोहुवानान्) निरन्तर बुलाये हुए (नॄन्) जन और (अतूतुजिम्) निरन्तर न हिंसा करनेवाले को (रोदसी) आकाश और पृथिवी के (न) समान आप (सम्, निनेथ) अच्छे प्रकार पहुँचाते हो उन (तव) आप की (प्रणीती) उत्तम नीति के साथ हम लोग राज्य पालें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो राजपुरुष सूर्य और पृथिवी के समान समस्त प्रजाजनों को धारण कर धर्म को पहुँचावें, वे नीति जाननेवाले समझने चाहियें ॥३॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥