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Rigveda Mandal 7 / Sukta 28 / Mantra 2

104 Sukta
5 Mantra
7/28/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हवं॑ त इन्द्र महि॒मा व्या॑न॒ड् ब्रह्म॒ यत्पासि॑ शवसि॒न्नृषी॑णाम्। आ यद्वज्रं॑ दधि॒षे हस्त॑ उग्र घो॒रः सन्क्रत्वा॑ जनिष्ठा॒ अषा॑ळ्हाः ॥२॥

हव॑म् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । म॒हि॒मा । वि । आ॒न॒ट् । ब्रह्म॑ । यत् । पासि॑ । श॒व॒सि॒न् । ऋषी॑णाम् । आ । यत् । वज्र॑म् । द॒धि॒षे । हस्ते॑ । उ॒ग्र॒ । घो॒रः । सन् । क्रत्वा॑ । ज॒नि॒ष्ठाः॒ । अषा॑ळ्हः ॥

Mantra without Swara
हवं त इन्द्र महिमा व्यानड् ब्रह्म यत्पासि शवसिन्नृषीणाम्। आ यद्वज्रं दधिषे हस्त उग्र घोरः सन्क्रत्वा जनिष्ठा अषाळ्हाः ॥

हवम्। ते। इन्द्र। महिमा। वि। आनट्। ब्रह्म। यत्। पासि। शवसिन्। ऋषीणाम्। आ। यत्। वज्रम्। दधिषे। हस्ते। उग्र। घोरः। सन्। क्रत्वा। जनिष्ठाः। अषाळ्हाः ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शवसिन्) बहुत प्रकार के बल और (उग्र) तेजस्वी स्वभाव युक्त (इन्द्र) दुष्टों के विदारनेवाला राजा ! (यत्) जो (ते) आप का (महिमा) प्रशंसा समूह (हवम्) प्रशंसनीय वाणियों के व्यवहार को और (ब्रह्म) धन को (व्यानट्) व्याप्त होता है तथा आप (ऋषीणाम्) वेदार्थवेत्ताओं के (हवम्) प्रशंसनीय वाणी व्यवहार की (पासि) रक्षा करते हो और (यत्) जिस (वज्रम्) शस्त्रसमूह को (हस्ते) हाथ में (आ, दधिषे) अच्छे प्रकार धारण करते हो और (घोरः) मारनेवाले (सन्) होकर (क्रत्वा) प्रज्ञा वा कर्म से (अषाळ्हाः) न सहने योग्य शत्रु सेनाओं को (जनिष्ठाः) प्रगट करो अर्थात् ढिठाई उन की दूर करो सो तुम हम लोगों से सत्कार पाने योग्य हो ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो शस्त्र और अस्त्रों के प्रयोगों का करने धनुर्वेदादिशास्त्रों का जानने और प्रशंसायुक्त सेनावाला हो और जिस की पुण्यरूपी कीर्त्ति वर्त्तमान है, वही शत्रुओं के मारने और प्रजाजनों के पालने में समर्थ होता है ॥२॥
Subject
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥