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Rigveda Mandal 7 / Sukta 27 / Mantra 4

104 Sukta
5 Mantra
7/27/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नू चि॑न्न॒ इन्द्रो॑ म॒घवा॒ सहू॑ती दा॒नो वाजं॒ नि य॑मते न ऊ॒ती। अनू॑ना॒ यस्य॒ दक्षि॑णा पी॒पाय॑ वा॒मं नृभ्यो॑ अ॒भिवी॑ता॒ सखि॑भ्यः ॥४॥

नु । चि॒त् । नः॒ । इन्द्रः॑ । म॒घऽवा॑ । सऽहू॑ती । दा॒नः । वाज॑म् । नि । य॒म॒ते॒ । नः॒ । ऊ॒ती । अनू॑ना । यस्य॑ । दक्षि॑णा । पी॒पाय॑ । वा॒मम् । नृऽभ्यः॑ । अ॒भिऽवी॑ता । सखि॑ऽभ्यः ॥

Mantra without Swara
नू चिन्न इन्द्रो मघवा सहूती दानो वाजं नि यमते न ऊती। अनूना यस्य दक्षिणा पीपाय वामं नृभ्यो अभिवीता सखिभ्यः ॥

नु। चित्। नः। इन्द्रः। मघऽवा। सऽहूती। दानः। वाजम्। नि। यमते। नः। ऊती। अनूना। यस्य। दक्षिणा। पीपाय। वामम्। नृऽभ्यः। अभिऽवीता। सखिऽभ्यः ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (मघवा) बहुत धन युक्त (दानः) देनेवाला (इन्द्रः) बिजुली के समान विद्या में व्याप्त (नः) हम लोगों को (सहूती) एकसी प्रशंसा (ऊत्या) तथा रक्षा आदि क्रिया से (नः) हम लोगों के लिये (वाजम्) धन वा अन्न को (नि, यमते) निरन्तर देता है (यस्य) जिसकी (चित्) निश्चित (सखिभ्यः) मित्र (नृभ्यः) मनुष्यों के लिये (अनूना) पूरी (अभिवीता) सब ओर से व्याप्त समय (दक्षिणा) दक्षिणा और (वामम्) प्रशंसा करने योग्य कर्म (पीपाय) बढ़ता है वह सब के लिये (नु) शीघ्र सुख देनेवाला होता है ॥४॥
Essence
जो राजा आदि जन यथावत् पुरुषार्थ से सब मनुष्यों को अधर्म से धर्म में प्रवृत्त करा अभय उत्पन्न कराते हैं, वे प्रशंसनीय होते हैं ॥४॥
Subject
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥