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Rigveda Mandal 7 / Sukta 27 / Mantra 2

104 Sukta
5 Mantra
7/27/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य इ॑न्द्र॒ शुष्मो॑ मघवन्ते॒ अस्ति॒ शिक्षा॒ सखि॑भ्यः पुरुहूत॒ नृभ्यः॑। त्वं हि दृ॒ळ्हा म॑घव॒न्विचे॑ता॒ अपा॑ वृधि॒ परि॑वृतं॒ न राधः॑ ॥२॥

यः । इ॒न्द्र॒ । शुष्मः॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । ते॒ । अस्ति॑ । शिक्ष॑ । सखि॑ऽभ्यः । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । नृऽभ्यः॑ । त्वम् । हि । दृ॒ळ्हा । म॒घ॒ऽव॒न् । विऽचे॑ताः । अप॑ । वृ॒धि॒ । परि॑ऽवृतम् । न । राधः॑ ॥

Mantra without Swara
य इन्द्र शुष्मो मघवन्ते अस्ति शिक्षा सखिभ्यः पुरुहूत नृभ्यः। त्वं हि दृळ्हा मघवन्विचेता अपा वृधि परिवृतं न राधः ॥

यः। इन्द्र। शुष्मः। मघऽवन्। ते। अस्ति। शिक्ष। सखिऽभ्यः। पुरुऽहूत। नृऽभ्यः। त्वम्। हि। दृळ्हा। मघऽवन्। विऽचेताः। अप। वृधि। परिऽवृतम्। न। राधः ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) परम पूजित धनवान् (इन्द्र) परमैश्वर्य देनेवाले ! (यः) जो (ते) आपका (शुष्मः) पुष्कल बलयुक्त व्यवहार (अस्ति) है, हे (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त ! जो आपकी (सखिभ्यः) मित्रों के लिये वा (नृभ्यः) अपने राज्य में नायक मनुष्यों के लिये (शिक्षा) सिखावट है, हे (मघवन्) बहुधनयुक्त ! जो आपके (दृळ्हा) दृढ़ शत्रु सैन्यजन हैं उनसे (विचेताः) विविध प्रकार वा विशिष्ट बुद्धि जिनकी वह (त्वम्) आप (हि) (परिवृतम्) सब ओर से स्वीकार किये (राधः) धन को (न) जैसे वैसे दृढ़ शत्रुसेनाजनों को (अपा, वृधि) दूर कीजिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । वही राजा सदा बढ़ता है, जो अपराधी मित्रों को भी दण्ड देने के बिना नहीं छोड़ता, जो ऐसा सदैव उत्तम यत्न करता है, जिससे कि अपने मित्र उदासीन वा शत्रु अधिक न हों और जो सदैव विद्या और शिक्षा की वृद्धि के लिये प्रयत्न करता है, वही सब दुष्ट और लोककण्टक डाकुओं को निवार के राज्य करने के योग्य होता है ॥२॥
Subject
फिर वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥