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Rigveda Mandal 7 / Sukta 26 / Mantra 4

104 Sukta
5 Mantra
7/26/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वा तमा॑हुरु॒त शृ॑ण्व॒ इन्द्र॒ एको॑ विभ॒क्ता त॒रणि॑र्म॒घाना॑म्। मि॒थ॒स्तुर॑ ऊ॒तयो॒ यस्य॑ पू॒र्वीर॒स्मे भ॒द्राणि॑ सश्चत प्रि॒याणि॑ ॥४॥

ए॒व । तम् । आ॒हुः॒ । उ॒त । शृ॒ण्वे॒ । इन्द्रः॑ । एकः॑ । वि॒ऽभ॒क्ता । त॒रणिः॑ । म॒घाना॑म् । मि॒थःऽतुरः॑ । ऊ॒तयः॑ । यस्य॑ । पू॒र्वीः । अ॒स्मे इति॑ । भ॒द्राणि॑ । स॒श्च॒त॒ । प्रि॒याणि॑ ॥

Mantra without Swara
एवा तमाहुरुत शृण्व इन्द्र एको विभक्ता तरणिर्मघानाम्। मिथस्तुर ऊतयो यस्य पूर्वीरस्मे भद्राणि सश्चत प्रियाणि ॥

एव। तम्। आहुः। उत। शृण्वे। इन्द्रः। एकः। विऽभक्ता। तरणिः। मघानाम्। मिथःऽतुरः। ऊतयः। यस्य। पूर्वीः। अस्मे इति। भद्राणि। सश्चत। प्रियाणि ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यस्य) जिसकी (पूर्वीः) पुरातन (मिथस्तुरः) परस्पर शीघ्रता करती हुई (ऊतयः) रक्षायें (अस्मे) हम लोगों में (प्रियाणि) मनोहर (भद्राणि) कल्याण करनेवाले काम (सश्चत) सम्बन्ध करें जो (एकः) एक (मघानाम्) धनों के (विभक्ता) सत्य असत्य का विभाग करने वा (तरणिः) तारनेवाला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्ययुक्त जीव धर्म की सेवा करता है (तम्, एव) उसी को आप्त शिष्ट धर्मशील सज्जन धर्मात्मा (आहुः) कहते हैं (उत) निश्चय उसी का उपदेश मैं (शृण्वे) सुनता हूँ ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसकी प्रशंसा आप्त विद्वान् जन करें वा जिसके धर्मयुक्त कर्मों को समस्त प्रजा प्रीति से चाहे, जो सत्य झूठ को यथावत् अलग कर न्याय करे, वही हमारा राजा हो ॥४॥
Subject
फिर कौन इस जगत् में राजा होने योग्य होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥