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Rigveda Mandal 7 / Sukta 26 / Mantra 3

104 Sukta
5 Mantra
7/26/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च॒कार॒ ता कृ॒णव॑न्नू॒नम॒न्या यानि॑ ब्रु॒वन्ति॑ वे॒धसः॑ सु॒तेषु॑। जनी॑रिव॒ पति॒रेकः॑ समा॒नो नि मा॑मृजे॒ पुर॒ इन्द्रः॒ सु सर्वाः॑ ॥३॥

च॒कार॑ । ता । कृ॒णव॑त् । नू॒नम् । अ॒न्या । यानि॑ । ब्रु॒वन्ति॑ । वे॒धसः॑ । सु॒तेषु॑ । जनीः॑ऽइव । पतिः॑ । एकः॑ । स॒मा॒नः । नि । म॒मृ॒जे॒ । पुरः॑ । इन्द्रः॑ । सु । सर्वाः॑ ॥

Mantra without Swara
चकार ता कृणवन्नूनमन्या यानि ब्रुवन्ति वेधसः सुतेषु। जनीरिव पतिरेकः समानो नि मामृजे पुर इन्द्रः सु सर्वाः ॥

चकार। ता। कृणवत्। नूनम्। अन्या। यानि। ब्रुवन्ति। वेधसः। सुतेषु। जनीःऽइव। पतिः। एकः। समानः। नि। ममृजे। पुरः। इन्द्रः। सु। सर्वाः ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! जैसे (वेधसः) मेधावी जन (सुतेषु) उत्पन्न हुए विज्ञान और बलों में उपदेश करने योग्यों को (यानि) जिन उपदेश-वचनों को तथा (अन्या) और वचनों को (ब्रुवन्ति) कहते हैं (ता) उनको आप (नूनम्) निश्चित (कृणवत्) करें वा जैसे (समानः) पक्षपात रहित (पतिः) स्वामी राजा (एकः) अकेला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यवान् (जनीरिव) उत्पन्न हुई प्रजा के समान (सु, सर्वाः) सम्यक् समस्त प्रजा को (पुरः) पहिले (नि, मामृजे) निरन्तर पवित्र करता है, वैसे इसको आप (चकार) करो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! तुम विद्वानों के उपदेश के अनुकूल ही आचरण करो जैसे धार्मिक, जितेन्द्रिय, विद्वान् राजा पक्षपात छोड़ के अपनी प्रजा न्याय से रखता है, वैसे प्रजाजन इस राजा की निरन्तर रक्षा करें, ऐसे करने से निरन्तर सब को निश्चल सुखलाभ होता है ॥३॥
Subject
फिर मनुष्य किसके तुल्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥