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Rigveda Mandal 7 / Sukta 26 / Mantra 1

104 Sukta
5 Mantra
7/26/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न सोम॒ इन्द्र॒मसु॑तो ममाद॒ नाब्र॑ह्माणो म॒घवा॑नं सु॒तासः॑। तस्मा॑ उ॒क्थं ज॑नये॒ यज्जुजो॑षन्नृ॒वन्नवी॑यः शृ॒णव॒द्यथा॑ नः ॥१॥

न । सोमः॑ । इन्द्र॑म् । असु॑तः । म॒मा॒द॒ । न । अब्र॑ह्माणः । म॒घऽवा॑नम् । सु॒तासः॑ । तस्मै॑ । उ॒क्थम् । ज॒न॒ये॒ । यत् । जुजो॑षत् । नृ॒ऽवत् । नवी॑यः । शृ॒णव॑त् । यथा॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
न सोम इन्द्रमसुतो ममाद नाब्रह्माणो मघवानं सुतासः। तस्मा उक्थं जनये यज्जुजोषन्नृवन्नवीयः शृणवद्यथा नः ॥

न। सोमः। इन्द्रम्। असुतः। ममाद। न। अब्रह्माणः। मघऽवानम्। सुतासः। तस्मै। उक्थम्। जनये। यत्। जुजोषत्। नृऽवत्। नवीयः। शृणवत्। यथा। नः ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (यथा) जैसे (असुतः) न उत्पन्न हुआ (सोमः) महौषधियों का रस यह (इन्द्रम्) इन्द्रियों के स्वामी जीव को (न) नहीं (ममाद) हर्षित करता वा जैसे (अब्रह्माणः) चार वेदों का वेत्ता जो नहीं वे (सुतासः) उत्पन्न हुए (मघवानम्) परमपूजित धनवान् को (न) नहीं आनन्दित करते हैं, वह इन्द्रियस्वामी जीव (यत्) जिस (नृवत्) नृवत् अर्थात् जिसमें बहुत नायक मनुष्य विद्यमान और (नवीयः) अत्यन्त नवीन (उक्थम्) उपदेश को (जुजोषत्) सेवता है (नः) हम लोगों को (शृणवत्) सुनता है (तस्मै) उसके लिये सब प्रकार के विधानों को मैं (जनये) उत्पन्न करता हूँ ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे बुद्धिमान् मनुष्यो ! जैसे उत्पन्न हुआ पदार्थ जीव को आनन्द देता है, जैसे यथावत् वेदविद्या और आप्तजन धार्मिक धनाढ्य को विद्वान् करते हैं, वैसे उत्पन्न हुई विद्या आत्मा को सुख देती है और शुभगुण धनाढ्य को बढ़ाते हैं और सत्संग से ही मनुष्यत्व को जीव प्राप्त होता है ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले छब्बीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में जीव का उपकार कौन नहीं कर सकता, इस विषय को कहते हैं ॥