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Rigveda Mandal 7 / Sukta 25 / Mantra 5

104 Sukta
6 Mantra
7/25/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कुत्सा॑ ए॒ते हर्य॑श्वाय शू॒षमिन्द्रे॒ सहो॑ दे॒वजू॑तमिया॒नाः। स॒त्रा कृ॑धि सु॒हना॑ शूर वृ॒त्रा व॒यं तरु॑त्राः सनुयाम॒ वाज॑म् ॥५॥

कुत्सा॑ । ए॒ते । हर्यि॑ऽअश्वाय । शू॒षम् । इन्द्रे॑ । सहः॑ । दे॒वऽजू॑तम् । इ॒या॒नाः । स॒त्रा । कृ॒धि॒ । सु॒ऽहना॑ । शू॒र॒ । वृ॒त्रा । व॒यम् । तरु॑त्राः । स॒नु॒या॒म॒ । वाज॑म् ॥

Mantra without Swara
कुत्सा एते हर्यश्वाय शूषमिन्द्रे सहो देवजूतमियानाः। सत्रा कृधि सुहना शूर वृत्रा वयं तरुत्राः सनुयाम वाजम् ॥

कुत्सा। एते। हर्यिऽअश्वाय। शूषम्। इन्द्रे। सहः। देवऽजूतम्। इयानाः। सत्रा। कृधि। सुऽहना। शूर। वृत्रा। वयम्। तरुत्राः। सनुयाम। वाजम् ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) निर्भय ! जिन (इन्द्रे) परमैश्वर्य्ययुक्त आप में (हर्यश्वाय) प्रशंसित जिसके मनुष्य वा घोड़े उसके लिये (एते) ये (कुत्साः) वज्र अस्त्र और शस्त्र आदि समूह हों उनको और (देवजूतम्) देवों से पाये हुए (शूषम्) बल तथा (सहः) क्षमा (इयानाः) प्राप्त होते हुए (तरुत्राः) दुःख से सबको अच्छे प्रकार तारनेवाले (वयम्) हम लोग (वाजम्) विज्ञान को (सनुयाम) याचें आप (सत्रा) सत्य से (वृत्रा) दुःखों को (सुहना) नष्ट करने के लिये सुगम (कृधि) करो ॥ ५ ॥
Essence
हे राजा ! यदि राज्य पालने वा बढ़ाने को आप चाहें तो शस्त्र अस्त्र और सेना जनों को निरन्तर ग्रहण करो, फिर सत्य आचार को माँगते हुए निरन्तर बढ़ो और हम लोगों को बढ़ाओ ॥ ५ ॥
Subject
फिर उस राजा को क्या अवश्य करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥