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Rigveda Mandal 7 / Sukta 25 / Mantra 4

104 Sukta
6 Mantra
7/25/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वाव॑तो॒ ही॑न्द्र॒ क्रत्वे॒ अस्मि॒ त्वाव॑तोऽवि॒तुः शू॑र रा॒तौ। विश्वेदहा॑नि तविषीव उग्रँ॒ ओकः॑ कृणुष्व हरिवो॒ न म॑र्धीः ॥४॥

त्वाऽव॑तः । हि । इ॒न्द्र॒ । क्रत्वे॑ । अस्मि॑ । त्वाऽव॑तः । अ॒वि॒तुः । शू॒र॒ । रा॒तौ । विश्वा॑ । इत् । अहा॑नि । त॒वि॒षी॒ऽवः॒ । उ॒ग्र॒ । ओकः॑ । कृ॒णु॒ष्व॒ । ह॒रि॒ऽवः॒ । न । म॒र्धीः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वावतो हीन्द्र क्रत्वे अस्मि त्वावतोऽवितुः शूर रातौ। विश्वेदहानि तविषीव उग्रँ ओकः कृणुष्व हरिवो न मर्धीः ॥

त्वाऽवतः। हि। इन्द्र। क्रत्वे। अस्मि। त्वाऽवतः। अवितुः। शूर। रातौ। विश्वा। इत्। अहानि। तविषीऽवः। उग्र। ओकः। कृणुष्व। हरिऽवः। न। मर्धीः ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 4

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Meaning
हे (तविषीवः) प्रशंसित सेना वा (हरिवः) प्रशंसित हरणशील मनुष्योंवाले (शूर) निर्भय (इन्द्र) सेनापति ! (हि) जिस कारण मैं (विश्वा, इत्) सभी (अहानि) दिनों (त्वावतः) तुम्हारे समान के (क्रत्वे) बुद्धि वा कर्म के लिये प्रवृत्त हूँ (त्वावतः) और आपके सदृश (अवितुः) रक्षा करनेवाले के (रातौ) दान के निमित्त उद्यत (अस्मि) हूँ उस मेरे लिये (उग्रः) तेजस्वी आप (ओकः) घर (कृणुष्व) सिद्ध करो, बनाओ और अधार्मिक किसी जन को (न)(मर्धीः) चाहो ॥४॥
Essence
हे धार्मिक राजा ! जिससे आप सबकी रक्षा के लिये सदा प्रवृत्त होते हो, इससे तुम्हारी रक्षा में हम लोग सर्वदा प्रवृत्त हैं ॥४॥
Subject
फिर वे राजा और प्रजाजन परस्पर में कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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