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Rigveda Mandal 7 / Sukta 25 / Mantra 2

104 Sukta
6 Mantra
7/25/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नि दु॒र्ग इ॑न्द्र श्नथिह्य॒मित्रा॑न॒भि ये नो॒ मर्ता॑सो अ॒मन्ति॑। आ॒रे तं शंसं॑ कृणुहि निनि॒त्सोरा नो॑ भर सं॒भर॑णं॒ वसू॑नाम् ॥२॥

नि । दुः॒ऽगे । इ॒न्द्र॒ । श्न॒थि॒हि॒ । अ॒मित्रा॑न् । अ॒भि । ये । नः॒ । मर्ता॑सः । अ॒मन्ति॑ । आ॒रे । तम् । शंस॑म् । कृ॒णु॒हि॒ । नि॒नि॒त्सोः । आ । नः॒ । भ॒र॒ । स॒म्ऽभर॑णम् । वसू॑नाम् ॥

Mantra without Swara
नि दुर्ग इन्द्र श्नथिह्यमित्रानभि ये नो मर्तासो अमन्ति। आरे तं शंसं कृणुहि निनित्सोरा नो भर संभरणं वसूनाम् ॥

नि। दुःऽगे। इन्द्र। श्नथिहि। अमित्रान्। अभि। ये। नः। मर्तासः। अमन्ति। आरे। तम्। शंसम्। कृणुहि। निनित्सोः। आ। नः। भर। सम्ऽभरणम्। वसूनाम् ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) दुष्ट शत्रुओं के निवारनेवाला राजा ! (ये) जो (मर्त्तासः) मनुष्य (नः) हम लोगों को (दुर्गे) शत्रुओं को दुःख से पहुँचने योग्य परकोटा में (अमन्ति) रोगों को पहुँचाते हैं उन (अमित्रान्) सब के साथ द्रोहयुक्त रहने वालों को आप (नि, अभि, श्नथिहि) निरन्तर सब ओर से मारो, हम लोगों से (आरे) दूर उनको फेंको (निनित्सोः) और निन्दा की इच्छा करनेवाले से हम लोगों को दूर कर (नः) हम लोगों के (तम्) उस (शंसम्) प्रशंसनीय विजय को (कृणुहि) कीजिये तथा (वसूनाम्) द्रव्यादि पदार्थों के (संभरणम्) अच्छे प्रकार पोषण को (आ, भर) सब ओर से स्थापित कीजिये ॥२॥
Essence
हे राजा ! जो धूर्त मनुष्य ब्रह्मचर्य आदि के निवारण से मनुष्यों को रोगी करते हैं, उनको काराघर में बाँधो और जो अपनी प्रशंसा के लिये सब की निन्दा करते हैं, उनको समझा कर उत्तम प्रजाजनों से अलग रक्खो, ऐसे करने से आपकी बड़ी प्रशंसा होगी ॥२॥
Subject
फिर राजा को कौन दण्ड देने योग्य और निवारने योग्य हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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